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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 8

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.8

दुःखानुशयी द्वेष: ।। 8 ।।

शब्दार्थ

दुःख, ( कष्ट अथवा तकलीफ ) अनुशयी, ( को भोगने के बाद उस दुःख अथवा कष्ट के प्रति क्रोध या उसके नाश की इच्छा का होना ही ) द्वेष, ( द्वेष नामक क्लेश कहलाता है।)

सूत्रार्थ

दुःख या किसी कष्ट को भोगने के बाद उस दुःख के के प्रति उत्पन्न होने वाले आक्रोश को द्वेष नामक क्लेश कहते हैं ।

व्याख्या

इस सूत्र में द्वेष नामक क्लेश का स्वरूप बताया गया है । किसी भी प्रकार के दुःख अथवा तकलीफ को महसूस करने के बाद, उस दुःख व उसके कारण के प्रति क्रोध उत्पन्न होना ही द्वेष नामक क्लेश है ।

दुःख मुख्य रूप से तीन प्रकार के माने गए हैं -

  1. आध्यात्मिक दुःख
  2. आधिभौतिक दुःख
  3. आधिदैविक दुःख ।
  1. आध्यात्मिक दुःख ( दैहिक ) :- आध्यात्मिक दुःख वह दुःख होते हैं जो हमें शारीरिक व मानसिक रूप से कष्ट पहुँचाते हैं । इनको दैहिक दुःख इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह हमारी देह अर्थात शरीर में होते हैं । जैसे - बुखार, सरदर्द, उल्टी- दस्त लगना, बी.पी., मधुमेह आदि रोग होना शारीरिक दुःख हैं । इसी प्रकार मानसिक दुःख भी होते हैं जैसे - चिन्ता, तनाव, अनिद्रा व अवसाद आदि ।
  1. आधिभौतिक दुःख :- वह कष्ट या दुःख जो हमें भौतिक पदार्थों से प्राप्त होते हैं आधिभौतिक दुःख कहलाते हैं । जैसे - हिंसक पशुओं या जानवरों द्वारा कष्ट मिलना, सड़क दुर्घटना से मिलने वाला कष्ट आदि ।
  1. आधिदैविक दुःख :- वह दुःख या कष्ट जो हमें अलौकिक कारणों से मिलता है आधिदैविक दुःख कहलाता है । जैसे- सर्दी- गर्मी से मिलने वाला कष्ट, अकाल व अत्यधिक वर्षा से मिलने वाला कष्ट, व भूकम्प आदि से मिलने वाला दुःख ।

ऊपर वर्णित सभी दुःखों में से जब किसी भी प्रकार का दुःख या कष्ट हमें होता है । तो उस दुःख व उस दुःख के कारण के प्रति क्रोधित होकर उसका नाश करने की कोशिश करते रहते हैं । या उसके नाश की भावना रखते हैं ।

उदाहरण स्वरूप :- कई बार ज्यादा तला- भूना या बाहर का भोजन ग्रहण करने के कारण हमें उल्टी व दस्त लग जाते हैं । जिससे हमें कष्ट होता है । उस कष्ट या तकलीफ से पीड़ित होने से हमें हमारा ध्यान उसके कारण पर जाता है । कि यह रोग हमें किस कारण से हुआ है ? उसके पीछे जो भी कारण होता है, हम उसके प्रति क्रोधित हो उठते हैं । और उस कारण का नाश करने का पूरा प्रयास करते हैं । उसके नाश की भावना करना ही द्वेष कहलाता है ।

दूसरा हम इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जब हम अपनी गाड़ी से यातायात ( ट्रैफिक ) के नियमों का पालन करते हुए कहीं जा रहे होते हैं । तभी अचानक से कोई दूसरा वाहन गलत दिशा से आकर आपको टक्कर मार देता है । तब आपको उसकी गलती पर बहुत गुस्सा आता है । और आप गुस्से में आकर उसको बुरा- भला कहने लगते हो । या फिर उसके ऊपर हिंसा अर्थात उसको चोट पहुँचाने की कोशिश करते हो । यह गुस्से अथवा क्रोध का भाव ही द्वेष होता है । या कोई व्यक्ति हमें बिना किसी कारण के प्रताड़ित कर रहा होता है, तो उस व्यक्ति के प्रति भी हम क्रोध का भाव रखते हैं । और अवसर ( मौका ) मिलते ही उसको नुकसान पहुँचाने का भी प्रयास करते हैं । यही द्वेष नामक क्लेश होता है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. vikas

    Thanks g

  2. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! स्पष्ट व्याख्या ! धन्यवाद! ?

  3. Mamta

    Thank you sir

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ?? In above examples it is very natural to react, is it wrong…..than how will other person realize that he/she is wrong.? How to overcome such feeling?

  5. Manisha dahiya

    Thanks guru ji

  6. Jale singh

    Thank you sir?

  7. Nisha

    Thanku so much sir??

  8. Manisha dahiya

    Parnam guru ji and thanks