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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 12

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.12

क्लेशमूल: कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीय: ।। 12 ।।

शब्दार्थ

क्लेशमूल:, ( क्लेशों की उत्पत्ति का कारण अर्थात अविद्या ) कर्माशय:, ( कर्मों के संस्कारों का समुदाय ) दृष्ट, ( जो दिखाई दे रहा है अर्थात वर्तमान व ) अदृष्ट, ( जो दिखाई नहीं दे रहा अर्थात भविष्य के ) जन्मवेदनीय, ( जन्मों में भोगा जाने वाला अर्थात भुगतना पड़ता है । )

सूत्रार्थ

अविद्या आदि क्लेशों की उत्पत्ति के कारणों से जिस प्रकार के संस्कारों का समुदाय अर्थात समूह बनता है । उसको वर्तमान व भविष्य में भुगतना पड़ता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में वर्तमान व भविष्य के जन्म में मिलने वाले फल का कारण कर्मों के समूह को बताया है ।

कर्माशय अर्थात हमारे कर्मों का समूह दो प्रकार का होता है -

  1. दृष्ट जन्म वेदनीय
  2. अदृष्ट जन्म वेदनीय ।
  1. दृष्ट जन्म वेदनीय :- ऐसे कर्म जिनका फल हमें इसी जन्म में मिलता है । वह दृष्ट जन्म वेदनीय कर्म कहलाते हैं । इनमें तीव्र वेग ( तेज गति ) वाले कर्म होते हैं । जैसे - तीव्र वेग से तन्त्र - मन्त्र द्वारा ईश्वर, देवता व महऋषियों की उपासना करना या तीव्र गति से किसी के ऊपर हिंसा करना या किसी को दुःख देना आदि । यह वें कर्म है जिनका फल हमें शीघ्रता से मिलता है । और इसी जन्म में मिलता है । इसमें शुभ- अशुभ अर्थात पाप- पुण्य दोनों ही तरह के कर्म होते हैं ।
  1. अदृष्ट जन्म वेदनीय :- ऐसे कर्म जिनका फल हमें अगले जन्म में मिलता है । वह अदृष्ट जन्म वेदनीय कर्म कहलाते हैं । जैसे- स्वर्ग व नरक की प्राप्ति करवाने वाले कर्म । जिस प्रकार कर्म के संस्कारों से इस जन्म में दुःख की प्राप्ति होती है वैसे ही अगले जन्मों में भी होती है । यह वह कर्म होते हैं जिनका फल हमें देरी से मिलता है ।

जो व्यक्ति शुभ अर्थात अच्छे कर्म करता है उसे अच्छे फल की प्राप्ति होती है । और जो व्यक्ति अशुभ अर्थात बुरे कर्म करता है उसे बुरे फल की प्राप्ति होती है । दोनों ही ( शुभ- अशुभ ) कर्मों का फल इस जन्म व अगले जन्म में मिलता है ।

इन सभी कर्मों का फल हमें ईश्वर, देश का राजा या देश का कानून, समाज या फिर हम स्वंम अपने आप को देते हैं ।

ईश्वर हमें हमारे कर्मों के अनुसार अच्छी या बुरी जगह पर जन्म देता है । देश का राजा या देश का कानून हमें बुरे कर्म करने पर जेल की कैद और आर्थिक दण्ड अर्थात जुर्माना लगा देता है । इसी प्रकार अच्छे कर्मों के लिए कोई पदक या आर्थिक सहायता दी जाती है । समाज में भी अच्छे कर्मों के आधार पर ही लोगों का सम्मान किया जाता है । जो दुष्ट व्यक्ति होते हैं समाज उनका सम्मान नहीं करता । और जो व्यक्ति अच्छे कर्म करते हैं समाज उनका पूरा मान- सम्मान करता है ।

या फिर हम स्वंम अपने आप को कर्मों का फल दे लेते हैं । जैसे- अच्छे कर्मों के फल के रूप में हम अपने आप को प्रोत्साहित करते हैं । और बुरे कर्म करने पर हम पश्चाताप व मनोरोग आदि से स्वंम को दंडित करते हैं ।

इस प्रकार सभी अच्छे व बुरे कर्मों का कुछ फल इसी जन्म और कुछ का अगले जन्म में भुगतना पड़ता है ।

विशेष

इससे एक बात तो यह स्पष्ट होती है कि योगदर्शन पुनर्जन्म की अवधारणा को मानता है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ??good karma’s will only help us in our journey.

  2. Manisha dahiya

    Nice guru ji

  3. Aashish malhan

    Nice karma theory guru ji.

  4. Nisha

    Thanku sir ?

  5. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Sunder Sutra. Sunder vrnan.Dhanyavad aacharya ji! om ?