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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 38

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.38

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ।। 38 ।।

शब्दार्थ

ब्रह्मचर्य- प्रतिष्ठायां ( ब्रह्मचर्य के पूर्ण रूप से सिद्ध होने पर ) वीर्यलाभः ( सामर्थ्य अर्थात बल की प्राप्ति होती है । )

सूत्रार्थ

ब्रह्मचर्य व्रत का पूरी तरह से पालन करने से साधक को अनन्त सामर्थ्य अर्थात शारीरिक व मानसिक बल की प्राप्ति होती है ।

व्याख्या

इस सूत्र में ब्रह्मचर्य की सिद्धि का फल बताया गया है ।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है ईश्वर का चिन्तन और वीर्य का रक्षण करना ।

जो साधक अपनी साधना में ईश्वर का चिन्तन व वीर्य का रक्षण अर्थात रक्षा पूरे मन, वचन व कर्म से करते हैं । उनको अनन्त शारीरिक, मानसिक व बौद्विक बल की प्राप्ति होती है । और इस प्रकार ब्रह्मचर्य की शक्ति से साधक अपने सामर्थ्य को बढ़ाता है । उसके बाद वह अपने शिष्यों में भी ज्ञान को बढ़ाने में समर्थ होता है ।

ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है । और वह दीर्घायु को प्राप्त होता है । ब्रह्मचर्य को स्वस्थ जीवन का आधार बताया गया है ।

वीर्य की रक्षा करने से साधक अपनी शारीरिक, मानसिक व बौद्विक शक्तियों को इतना बढ़ा लेता है कि कोई सामान्य व्यक्ति उसकी बराबरी नहीं कर पाता है ।

ब्रह्मचर्य का बल अपार होता है । जितना आनन्द वीर्य को व्यर्थ करने में आता है । उससे कई सौ गुना आनन्द उसके रक्षण करने में आता है । केवल थोड़े से क्षाणिक सुख के लिए हम अपने महान बल को बर्बाद कर देते हैं । बिना वीर्य की रक्षा के कोई भी साधक साधना में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता ।

अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य के विषय में कहा गया है कि “ब्रह्मचर्य के तप से साधक मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है” * ।

* ।। अथर्ववेद 11/5/19 ।।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thank you so much sit??

  2. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Bhut sunder Satya! Om! Dhanyavad! ?

  3. Manisha dahiya

    Nice line guru ji thanks

  4. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    ब्रम्हचर्य की महिमा अपरम्पार है।

    अति सुन्दर व्याख्या।

  5. Anju siwach

    THANK YOU VERY MUCH SIR

  6. aashish malhan

    Barmcharya is more important for us in success guru ji.