Skip to content

Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 40

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.40

शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्ग: ।। 40 ।।

शब्दार्थ

शौचत् ( शुद्धि के सिद्ध होने पर ) स्व ( स्वयं यानी अपने ) अङ्ग ( अंगो अर्थात शरीर के हिस्सों से ) जुगुप्सा ( घृणा या विरक्ति ) परै: ( तथा दूसरों के शरीर से भी ) असंसर्ग: ( सम्पर्क या सम्बन्ध बनाने की इच्छा नहीं रहती )

सूत्रार्थ

शौच के सिद्ध हो जाने पर साधक अपने शरीर के अंगों से घृणा करने लगता है । साथ ही दूसरों के शरीर से भी उसकी सम्पर्क या सम्बन्ध बनाने की इच्छा समाप्त हो जाती है ।

व्याख्या

इस सूत्र में शौच के प्रतिफल को बताया गया है ।

शुद्धि दो प्रकार की होती है- एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक । जब साधक शौच अर्थात शुद्धि की पालना करने लगता है तो उसे अपने शरीर व मन में अनेकों दोष व दुर्गुण नजर आने लगते हैं । व्यक्ति जैसे- जैसे शुद्धि का पालन करता है वैसे- वैसे उसे शरीर व मन की गन्दगी का पता चलता है । इससे उसको आभास होने लगता है कि मनुष्य का यह शरीर अनेकों प्रकार के मलों ( गन्दगी ) से भरा पड़ा है ।

जैसे- पसीना, मल- मूत्र आदि ।

यदि हम नियमित रूप से अपने शरीर की शुद्धि न करें तो इस शरीर से बदबू आने लगेगी । इसलिए हम अपने शरीर की पानी व मिट्टी आदि से बाह्य शुद्धि करते हैं ।

ठीक इसी प्रकार हमारा मन भी अनेकों प्रकार के मलों से भरा पड़ा है । जैसे- ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, अहंकार आदि । इन्हें आन्तरिक मल अथवा गन्दगी कहते हैं । इनसे भी हमें बुरे विचारों की दुर्गन्ध आती है । जो हमारा जीना मुहाल कर देती है । अतः इसके लिए हम सत्य, सौहार्द, प्रेम व समानता आदि से अपनी मानसिक या आन्तरिक शुद्धि करते हैं ।

इस प्रकार शुद्धि करते - करते हमें अपने शरीर की गन्दगी का ज्ञान भली भाँति हो जाता है । जिससे हमें अपने शरीर के अंगों से घृणा अर्थात अनासक्ति हो जाती है । साथ ही हमें दूसरे व्यक्तियों के शरीर से भी आसक्ति नहीं रहती । जिसके फलस्वरूप हमारी दूसरों के शरीर के साथ भी कोई सम्बंध बनाने की इच्छा समाप्त हो जाती है । क्योंकि उनके शरीरों में भी हम गन्दगी देखकर उनसे आनाशक्त हो जाते हैं ।

जब तक हमारी आसक्ति इस शरीर से रहेगी तब तक हमारे भीतर वैराग्य का भाव जागृत नहीं हो सकता है । और बिना वैराग्य के मुक्ति सम्भव नहीं है ।

इसलिए शौच की सिद्धि से हमें योग साधना में सहायता मिलती है ।

Reader discussion

Comments (10)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanku sir ??

  2. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Aatma gyan! Dhanyavad! ?

  3. Vicky Sadh

    श्रीमान जी,

    माफी चाहूंगा मगर,

    अपने अंगो से घृणा होना थोड़ा संदेहात्मक सा लगता है,

    हम घृणा की जगह मोह-भंग शब्द का प्रयोग कर सकते हैं ।

    क्यूंकि मोक्ष प्राप्ति में घृणा, नफरत, मारना या तोड़ना जैसे शब्दों का स्थान नं होकर वैराग , मोह भंग, परिवर्तन और ध्यान को गलत जगह से हटाकर सही जगह लगाने जैसे शब्द उचित रहते हैं ।

    आपका अपना

    क्रान्तिकारी विक्की साध दरियावाला

  4. आलोक कुमार पटवा

    विक्की साध जी सादर नमस्कार*

    विक्की जी !

    आचार्य श्री ने घृणा शब्द का प्रयोग इसलिए किया है ताकि मृदु साधक(सामान्य योगाभ्यार्थी) भी इस सूत्र के वास्तविक अर्थ को सहज ही ग्रहण/(समझ) कर सकें।

  5. Vinod Sharma

    अति सुंदर ।।

  6. Arun Dhillon

    बहुत सुंदर व्याख्या सर जी

  7. aashish malhan

    We will concentrate on both internal and external clearence guru ji.

  8. Manisha dahiya

    Nice guru ji

  9. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव *

    आप ऐसे ही हम जैसे मृदु साधक का मार्ग दर्शन करते रहें, अत्युत्तम व्याख्या। आपको कोटि_ कोटि धन्यवाद ।

  10. Anju siwach

    Thank you sir