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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 15

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.15

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिन: ।। 15 ।।

शब्दार्थ

परिणाम दुःख, ( भौतिक सुखों को भोगने के बाद राग से उत्पन्न दुःख ) ताप दुःख, ( सुख में बाधा डालने वाले के प्रति द्वेष करने से उत्पन्न दुःख ) संस्कार दुःख, ( सुख व दुःख के संस्कार बनने से सुख की इच्छा पूरी न होने से उत्पन्न दुःख ) च, ( और ) गुणवृत्ति, ( सत्त्व, रज, तम के कार्य में ) विरोध दुःख ( उनके आपसी मतभेद से उत्पन्न दुःख के कारण ) विवेकिन:, ( विवेकी पुरुषों के लिए ) सर्वम्, ( सभी ) दुःखम् एव, ( दुःख का ही रूप है । )

सूत्रार्थ

परिणाम दुःख, ताप दुःख,  संस्कार दुःख और सत्त्व, रज व तम के कार्यों में आपसी मतभेद के कारण उत्पन्न होने वाला दुःख । यह सब एक योगी पुरुष के लिए दुःख का ही रूप होते हैं । अन्य कुछ नहीं ।

व्याख्या

इस सूत्र में विवेकी पुरूष के दृष्टिकोण को दिखाया गया है ।

इसमें मुख्य रूप से तीन प्रकार के दुःखो का वर्णन किया गया है ।

परिणाम दुःख :-  हम इन्द्रियों से मिलने वाली तृप्ति या सुखद अहसास को ही सुख समझने लगते हैं । लेकिन वास्तव में वह सुख नहीं है । इस प्रकार इन्द्रियों से उत्पन्न तृप्ति कभी भी शान्त नहीं होती बल्कि उनको और भी ज्यादा पाने की इच्छा होती रहती है । जैसे - स्वादिष्ट भोजन, सुन्दर स्त्री या पुरुष का सहयोग, आनन्द प्राप्ति के साधन आदि । इन सभी से हमें केवल एक क्षण के लिए तो आनंद मिलता है । लेकिन यह वास्तव में सुख नहीं है । यह एक पल की तृप्ति हमारी इन्द्रियों को कमजोर कर देती है । इसी को परिणाम दुःख कहते हैं ।

ताप दुःख :- सुख पहुँचाने वाले साधनों व व्यक्तियों के प्रति राग अर्थात आसक्ति होना । दुःख पहुँचाने वाले साधनों व व्यक्तियों के प्रति द्वेष या घृणा होना ही ताप दुःख कहलाता है । ये राग व द्वेष दोनों ही दुःख पहुँचाने वाले होते हैं ।

संस्कार दुःख :- मनुष्य में सुख के भोगने से सुख के संस्कार व दुःख को भोगने से दुःख के संस्कार बनते हैं । इन सुख व दुःख के संस्कारों से व्यक्ति इसी जीवन - मरण के चक्कर में फँसा रहता है । उसके चित्त में सुख व दुःख के संस्कार घूमते रहते हैं । यही संस्कार दुःख है ।

गुण वृत्ति विरोध दुःख :- गुण का अर्थ है सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण । वृत्ति का अर्थ है इनका कार्य । व विरोध का अर्थ होता है आपसी मतभेद । इन सभी गुणों का कार्य अलग- अलग होता है । सत्त्वगुण सुख, ज्ञान व प्रकाश का अनुभव करवाता है । रजोगुण इच्छाओं व चंचलता का अनुभव करवाता है । व तमोगुण अज्ञान व अंधकार का अनुभव करवाता है । लेकिन आपसी जब इन गुणों में आपसी तालमेल टूटता है तब यह एक दूसरे के ऊपर दबाव बनाते हैं । उसमें सत्त्वगुण रजोगुण पर रजोगुण तमोगुण पर व तमोगुण सत्त्वगुण पर प्रभावी होने का प्रयास करते रहते हैं । और एक गुण के प्रभावी होने से बाकी के दो गुण स्वंम ही दब जाते है । ऐसी अवस्था में शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं । यह स्थिति भी दुःख को उत्पन्न करने वाली होती है ।

यह सब उन व्यक्तियों के साथ होता है जिनके अन्दर विवेक नहीं होता । लेकिन जो विवेकी अर्थात योगी पुरुष होते हैं । उनके लिए यह सब केवल दुःख का ही एक रूप है । इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं ।

इस प्रकार के दुःखो से सामान्य व्यक्ति ही पीड़ित रहता है । विवेकी पुरूष नहीं ।

Reader discussion

Comments (10)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanks sir?

  2. Arun Dhillon

    Very nice sir ji

  3. Manisha dahiya

    Very nice guru ji

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Truly said sir

  5. Anju siwach

    Thank you sir

  6. Aashish malhan

    Nice explained about difference b/w yogiman and common man for life survive guru ji.

  7. Mamta

    Thankyou sir

  8. Mamta

    Thank you sir

  9. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! DHANYAVAD! ?

  10. Shweta mishra

    Thanku sir,,