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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 21

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.21

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ।। 21 ।।

शब्दार्थ

दृश्यस्य, ( दृश्य रूप प्रकृत्ति का ) आत्मा, ( स्वरूप ) एव, ( ही ) तदर्थ, ( उसके अर्थात दृष्टा के लिए हुआ है । )

सूत्रार्थ

उस दृश्य रूप प्रकृत्ति का स्वरूप उस पुरूष के लिए ही है । उसका और कोई प्रयोजन अर्थात उद्देश्य नहीं है ।

व्याख्या

इस सूत्र में प्रकृत्ति के प्रयोजन का वर्णन किया गया है ।

इस पूरी दृश्य रूप प्रकृत्ति का निर्माण पुरूष के लिए ही हुआ है । इसका दूसरा कोई उद्देश्य नहीं है । प्रकृत्ति स्वंम जड़ पदार्थ है । इसलिए यह न ही तो किसी पदार्थ की उत्पत्ति कर सकती है और न ही उनमें से किसी का उपयोग ।

उदाहरण स्वरूप :- जब हम अपने खेतों में गेहूँ, बाजरा या चावल आदि की फसल उगाते हैं । तो उसका क्या प्रयोजन होता है ? इसके उत्तर में हम कहेंगें कि वह अन्न उत्पन्न करने वाली फसल हम अपने खाने के लिए उगाते हैं । उसका इसके अतिरिक्त कोई दूसरा कारण नहीं होता है । साथ ही जब हम फसल को निकालते हैं तो उनमें से तुड़ा, भूसा या अवशिष्ट पदार्थ निकलते हैं । उनका क्या प्रयोजन होता है ? इसका उत्तर मिलेगा कि यह हमारे पशुओं का चारा है । इसके अलावा तो इसका कोई उद्देश्य नहीं है । उपर्युक्त उदाहरण से हमें पता चलता है कि अन्न पैदा करने वाली फसल का उद्देश्य मनुष्य के लिए भोजन उपलब्ध करवाना है । उनसे बचे हुए अवशिष्ट का उद्देश्य पशुओं के लिए चारा उपलब्ध करवाना है । इसके अतिरिक्त वह भूमि स्वंम उस फसल के अन्न व चारे का उपयोग अपने लिए नहीं करती है ।

ठीक इसी प्रकार इस प्रकृत्ति की रचना पुरूष के लिए ही हुई है । जिस प्रकार प्रकृत्ति जड़ पदार्थ है ठीक उसी प्रकार पुरूष चेतन है । बिना प्रकृत्ति के वह पुरूष न ही तो भोग कर सकता है और न ही अपवर्ग अर्थात मोक्ष की प्राप्ति ।

इसलिए इस दृश्य रूप प्रकृत्ति का उद्भव पुरूष के भोग व अपवर्ग के लिए ही हुआ है । इसका दूसरा कोई उद्देश्य नहीं है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Awesome sir thanku ??

  2. Manisha dahiya

    Very nice guru ji

  3. Anju siwach

    Example acche dete ho sir ji aap Thank u sir

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ??the real nature and purpose of Priorities explained so nicely.

  5. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Satya varnan! Dhanyavad?.