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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 10

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.10

ते प्रतिप्रसवहेया: सूक्ष्मा: ।। 10 ।।

शब्दार्थ

ते, ( वें ) सूक्ष्मा:, ( प्रभावहीन )  प्रतिप्रसवहेया, ( क्लेश चित्त के साथ ही प्रकृत्ति में लीन हो जाते हैं । )

सूत्रार्थ

चित्त के प्रकृत्ति में लीन होते ही वें प्रभावहीन सभी अविद्या आदि क्लेश भी चित्त के साथ ही प्रकृत्ति में लीन हो जाते हैं ।

व्याख्या

इसमें क्लेशों की प्रभावहीन अवस्था के परिणाम का वर्णन किया गया है । जब साधक योग साधना का अभ्यास करते हुए अपने चित्त को निर्मल बना लेता है । तब उस निर्मल चित्त के ऊपर साधक का पूर्ण अधिकार हो जाता है । और उसकी चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है । ऐसा चित्त अपने उपादान कारण अर्थात अपने उत्पत्ति के कारण प्रकृत्ति में लीन हो जाता है । ठीक इसी प्रकार से क्रियायोग से साधक अपने सभी क्लेशों को अत्यंत सूक्ष्म अर्थात प्रभावहीन कर देता है । वह प्रभावहीन किए गए क्लेश भी निर्मल किए गए चित्त के साथ ही प्रकृत्ति में लीन हो जाते हैं ।

क्लेशों को प्रभावहीन करने के लिए सबसे पहले साधक को क्रियायोग की साधना का अभ्यास करना पड़ता है । जैसे ही तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आदि क्रियाओं से क्लेश निर्बल होते हैं । वैसे ही वह निर्मल हुए चित्त की भाँति प्रकृत्ति में ही लीन अर्थात समाप्त हो जाते हैं ।

क्योंकि उन सभी क्लेशों का उपादान अर्थात उत्पत्ति का कारण भी स्वंम प्रकृत्ति ही है । अतः वह निर्बल हुए क्लेश भी प्रकृत्ति में लीन हो जाते हैं । जो वस्तु या पदार्थ जिससे उत्पन्न होता है अन्त में वह उसी में लीन होता है । जैसे - घड़े की उत्पत्ति मिट्टी से होती है । और जब घड़ा गल कर खत्म हो जाता है, तब वह वापिस मिट्टी में मिलने से दोबारा मिट्टी बन जाता है । ठीक इसी प्रकार चित्त व क्लेश भी अन्त में अपने -अपने उपादान अर्थात उत्पत्ति के कारण में ही लीन अर्थात मिल जाते हैं ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anju siwach

    Thank you very much sir

  2. vikash

    Thanks g

  3. Ashi

    Thanks?very nice

  4. Nisha

    Thanks aloottt sir??

  5. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ??nice one

  6. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! This sutra contains higher Philosophy ..thank you so much for this true knowledge **OM ?