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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 32

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.32

शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि नियमा: ।। 32 ।।

शब्दार्थ

शौच ( शुद्धि ) सन्तोष ( मेहनत से जो मिले, उसी में सब्र करना ) तप: ( द्वंद्वों को सहना ) स्वाध्याय ( मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन ) ईश्वर प्रणिधान ( समस्त कर्मों को भगवान को समर्पित कर देना )

सूत्रार्थ

शारीरिक व मानसिक शुद्धि, जो पुरुषार्थ के बाद मिले, उसमें सब्र करना, गर्मी- सर्दी आदि द्वंद्वों को सहना, मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन करना, व अपने सभी कर्मों का भगवान में अर्पण कर देना । यह सभी पाँच नियम कहे गए हैं ।

व्याख्या

इस सूत्र में अष्टांग योग के दूसरे अंग अर्थात नियम की चर्चा की गई है । यम की तरह ही नियम के भी पाँच भाग होते हैं । जिनका वर्णन इस प्रकार है -

  1. शौच :- शौच मुख्य रूप से दो प्रकार होती है । एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक ।

बाह्य शुद्धि :- बाह्य शौच में शरीर व भोजन आदि की पवित्रता को रखा गया है । हमें प्रतिदिन शुद्ध जल व मिट्टी आदि से शरीर के सभी अंगों की शुद्धि करनी चाहिए । साथ ही हमें प्रतिदिन शुद्ध, सात्त्विक व पवित्र भोजन ही ग्रहण करना चाहिए । यह सब बाह्य शुद्धि के साधन कहे जाते हैं ।

आन्तरिक शुद्धि :- आन्तरिक शुद्धि का अर्थ है अपने भीतर की शुद्धि करना । जब हमारे चित्त में मलिनता आ जाती है, तो हम योग मार्ग से दूर हो जाते हैं । इसलिए योग मार्ग में अग्रसर होने के लिए हमें सर्वप्रथम अपने चित्त को शुद्ध एवं पवित्र बनाना पड़ेगा । इस प्रकार चित्त के मलों को साफ करने के लिए आन्तरिक शुद्धि की आवश्यकता होती है । अविद्या आदि क्लेशों, काम, क्रोध, मोह, लोभ व अहंकार आदि का त्याग करने से हमारी आन्तरिक शुद्धि होती है ।

  1. सन्तोष :- सन्तोष को सबसे बड़ा सुख कहा गया है । घनघोर पुरुषार्थ ( सम्पूर्ण प्रयास ) करने के बाद जो फल मिले उसमें संतुष्टि ( सब्र ) रखना ही सन्तोष कहलाता है । कुछ लोगों का मानना है कि जो भी मिले, जितना भी मिले उसी में सब्र करना चाहिए । ज्यादा के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए । यही सन्तोष है । लेकिन यह सोचना कर्म सिद्धान्त के विरुद्ध है । इससे तो लोगों में अकर्मण्यता ( काम से जी चुराना ) का भाव पैदा हो जाएगा । कोई कुछ करेगा ही नहीं । इसलिए यह मानना बिल्कुल गलत है । काम करने में पूरा पुरुषार्थ होना चाहिए । हाँ उससे मिलने वाले फल में संतुष्टि होना सन्तोष होता है ।
  1. तप :- सभी अनुकूल व प्रतिकूल ( अच्छी व बुरी ) अवस्थाओं में स्वयं को सम अर्थात एक समान भाव में रखना ही तप कहलाता है । जैसे- सुख- दुःख, मान- अपमान, लाभ- हानि, सर्दी- गर्मी, जय- पराजय व भूख- प्यास आदि ।

तप के विषय में भी कुछ लोगों को भ्रान्ति है । उनका मानना है कि अपने शरीर को ज्यादा से ज्यादा कष्ट देना ही तप होता है । इस तरह के तप को शास्त्रों में तामसिक तप कहा है । जैसे- अपने चारों ओर अग्नि जलाकर तपना, जल में एक पैर पर खड़े रहना, महीनों तक भूखे रहना, मिट्टी का खड्डा खोदकर उसमें समाधि लगाना, नंगे पैर रहना, कई रातों तक न सोना, भूमि पर पैर न रखना आदि ।

तप का वास्तविक स्वरूप तो सभी द्वन्द्वों को शान्त चित्त से सहन करना होता है । अर्थात सुख में इतराना नहीं चाहिए और दुःख में तनाव नहीं लेना चाहिए । अपने शरीर को सर्दी और गर्मी दोनों को सहने लायक बनाना । जीत और हार दोनों को समान भाव से स्वीकार करना ही तप होता है ।

  1. स्वाध्याय :- स्वाध्याय का अर्थ है मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन करना व ईश्वर के प्रणव आदि नामों का जप करना । वेद व वेदों के अनुकूल अर्थात वेदों पर आधारित शास्त्रों व ग्रन्थों का ही अध्ययन हमें करना चाहिए । जैसे- वेद, उपनिषद, आस्तिक दर्शन व गीता आदि ।
  1. ईश्वर प्रणिधान :- बिना किसी लौकिक फल की इच्छा के अपने सभी कर्मों को ईश्वर में समर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान कहलाता है ।

ईश्वर ही हम सबका पालन करने वाला है । ईश्वर को ही सर्वे- सर्वा मानकर अपने सभी अच्छे व बुरे कर्मों का उसमें समर्पण करना चाहिए । और इसके पीछे किसी तरह के फल की इच्छा नहीं होनी चाहिए । निःस्वार्थ भाव से ईश्वर समर्पण होना ही ईश्वर प्रणिधान है ।

इस प्रकार नियम का स्वरूप कहा गया है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanks sir??

  2. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Thank you for this helpful explanation. ?

  3. Anju siwach

    Thank you sir

  4. Manisha dahiya

    Thanks guru ji

  5. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Really very helpful. Thank you

  6. Pooja yadav

    Thanks sir

  7. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    बहुत सुंदर व्याख्या ।

  8. Mamta

    Thank you sir