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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 36

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.36

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ।। 36 ।।

शब्दार्थ

सत्य- प्रतिष्ठायां ( सत्य अर्थात सच के सिद्ध हो जाने पर ) क्रियाफल-आश्रयत्वम् ( योगी के कहे हुए कथनों या वचनों के फल का प्रभाव अन्यों या दूसरों के ऊपर भी पड़ता है । )

सूत्रार्थ

जब योगी मन, वचन व कर्म से सत्य को सिद्ध कर लेता है, तब उसकी वाणी भी सिद्ध हो जाती है । उसके द्वारा कहे गए वचनों का प्रभाव दूसरों पर भी पड़ता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में सत्य की सिद्धि का फल बताया गया है ।

जब कोई योगी साधक सत्य का पूरे मन, वचन व कर्म से पालन करता है । तब उसकी वाणी भी सिद्ध हो जाती है ।

उसके द्वारा कहे गए वचन हमेशा सच होते हैं । जब वह किसी को कहता है कि तुम “धार्मिक हो जाओ” तो वह व्यक्ति धार्मिक हो जाता है । यदि वह किसी को कहता है कि तुम “स्वर्ग को प्राप्त करो” तो वह व्यक्ति वास्तव में स्वर्ग के सुख को प्राप्त करता है ।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह सम्भव है ? क्या मात्र सत्य के सिद्ध होने से इतनी बड़ी सिद्धि प्राप्त हो सकती है ? क्या उसके कहने से लोग धार्मिक या स्वर्ग के सुख को भोग सकते हैं ?

इन सभी प्रश्नो का उत्तर हाँ ही है । इसके लिए पहले यह जान लेना आवश्यक है कि सत्य को धारण करने वाला व्यक्ति सामान्य नहीं होता है । कोई भी व्यक्ति सत्य का आचरण करता है तो वह सबको एक समान भाव से देखता है । वह किसी के साथ भी किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता है ।

इस अवस्था में आने के बाद योगी का अपनी वाणी पर पूरी तरह से नियंत्रण होता है । वह  किसी भी प्रकार की अनावश्यक वार्तालाप नहीं करता है । वह सदैव उसी बात को कहता है जो उसे सत्य दिखाई देती है । वह उन्हीं व्यक्तियों को धार्मिक होने व स्वर्ग के सुख को प्राप्त करने की बात कहता है जो उसे पूरा कर सकते हैं । योगी को इतना आभास पहले से ही हो जाता है कि वह व्यक्तियों की पहचान अच्छी तरह से कर लेता है ।

आप देखेंगे कि प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा दिए गए वरदान ( आशीर्वाद ) और शाप कभी भी निष्फल नहीं होते थे । वह इसी लिए सफल होते थे क्योंकि ऋषि - मुनि अच्छी तरह से सोच - विचार करने के बाद ही कोई वरदान या शाप देते थे ।

यह सब उनकी तपस्या का ही परिणाम होता है कि दूसरों के लिए कही गई उनकी वाणी पूर्ण होती है ।

उदाहरण स्वरूप :- प्राचीन समय में हमारे देश के गुरुकुलों में जब विद्यार्थी विद्या अध्ययन के लिए आते थे । तब वह पूरे समय अपने आचार्यों के सानिध्य में रहते थे । जब वर्षों तक कोई सत्य सिद्ध आचार्य बच्चों का अवलोकन करता था । तो वह उसके विषय में जो भी भविष्यवाणी करता था वह पूरी होती थी । क्योंकि आचार्य उसके सभी क्रियाकलापों पर पूरा ध्यान रखता था । उसके बाद ही आचार्य उसके सम्बन्ध में कोई बात कहता था । और वह पूरी तरह से पूर्ण भी होती थी ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanku sir??

  2. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर वण॔न! सत्य सव॔त्र विजयते !धन्यवाद! ?

  3. Manisha dahiya

    Nice sir

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! The power of truth…… Thank you

  5. aashish malhan

    Few person,s in world obey truth rule,s guru ji.