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Yog Darshan

Yog Sutra 2 - 37

अध्याय 2: साधनपाद

मूल सूत्र · 2.37

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नो पस्थानम् ।। 37 ।।

शब्दार्थ

अस्तेय- प्रतिष्ठायां ( चोरी के भाव का पूरी तरह से अभाव होने पर अर्थात चोरी के भाव से पूरी तरह से मुक्ति प्राप्त होने पर ) सर्वरत्नो- पस्थानम् ( सभी प्रकार के उत्तम से उत्तम रत्न अर्थात पदार्थ प्रकट होते हैं । )

सूत्रार्थ

चोरी के भाव का पूरी तरह से अभाव होने पर साधक को सभी प्रकार के बढ़िया से बढ़िया पदार्थों की प्राप्ति होती है ।

व्याख्या

इस सूत्र में अस्तेय के फल का वर्णन किया गया है ।

अस्तेय का अर्थ है किसी भी वस्तु या पदार्थ को उसके मालिक की अनुमति के बिना न लेना । अर्थात किसी भी वस्तु को चोरी न करने का भाव होना ।

जब साधक पूरे मन, वचन व कर्म के भाव के साथ अस्तेय का पालन करता है, तो उसके पास किसी भी प्रकार की वस्तु या पदार्थ का अभाव नहीं रहता । उसे प्रत्येक वह वस्तु प्राप्त हो जाती है जिसकी उसे आवश्यकता होती है ।

चोरी न करने वाला व्यक्ति मेहनती होता है । वह कर्मयोगी होता है । प्रत्येक कार्य को वह पूरी ईमानदारी से करता है । और जब भी कोई व्यक्ति किसी कार्य को पूरी ईमानदारी के साथ करता है, तो उसे उनमे सिद्धि प्राप्त होती है । इस प्रकार कर्म करके मेहनत से कुछ कमाने में जिसका पूरा विश्वास है । उसे कभी भी किसी वस्तु या पदार्थ का अभाव नहीं रहता ।

मेहनती को इस पृथ्वी के उत्तम से उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है । वह सदा समाज में प्रतिष्ठा को प्राप्त करते हैं । और एक सम्पन्न जीवन जीते हैं ।

इसके विपरीत जो व्यक्ति चोरी करते हैं वह समाज में तिरस्कार को प्राप्त करते हैं । उनकी समाज में इज्जत नहीं होती है । और वह सदा अभाव का जीवन जीते हैं । क्योंकि चोरी से कभी भी स्थायी तरक्की नहीं की जा सकती है । इसलिए वह सदा अभाव में रहते हैं ।

उदाहरण स्वरूप :- इस उदाहरण में मैं आपको चोरों के विषय में एक बहुत पुरानी कहानी को आप सभी को बताना चाहता हूँ ।

एक बार एक राज्य में बहुत बड़े स्तर पर अन्न व धन का अभाव ( कमी ) हो जाता है । इस अभाव से त्रस्त होकर राजा ने एक यज्ञ का आयोजन करवाया । जिसमें बड़े- बड़े विद्वान आचार्यों को बुलाया गया । यज्ञ के प्रारम्भ होने से पूर्व राजा ने अपनी परेशानी आचार्यों के सामने रखी । तब आचार्यों ने कहा कि हे राजन! जब तक तुम्हारे राज्य में लोग चोरी के भाव का त्याग नहीं करेंगें, तब तक यह अभाव की स्थिति ऐसे ही बनी रहेगी । इसके लिए पूरे राज्य के लोग यदि चोरी न करने का संकल्प लेकर यज्ञ में आहुति डालते हैं, तो इसका समाधान हो सकता है । राजा व प्रजा सभी ने संकल्प लेकर यज्ञ में आहुति डाल दी । इसके बाद आचार्यों ने कहा कि इस यज्ञ की बची हुई आहुति को एक बक्से में बंद करके राज्य की सीमा से बाहर छोड़ आओ । यज्ञ के बाद ऐसा ही किया गया ।

उस बक्से को राज्य की सीमा से बाहर एक नदी के किनारे छोड़ दिया गया । तभी वहाँ पर कुछ चोर आए और उन्होंने देखा कि एक बहुत बड़ा बक्सा नदी किनारे पड़ा हुआ है । क्यों न इसको चुरा लिया जाए ? सभी चोरों ने सहमति जताकर उस बक्से को वहाँ से उठा लिया और उसे लेकर जंगल में चले गए । उन्होंने बड़ी उत्सुकता से उस बक्से को खोला । बक्सा खुलते ही उसमे से वह अभाव बाहर निकला तो सभी चोरों ने पूछा कि आप कौन हो ? तब उस अभाव ने कहा कि मैं अभाव हूँ । चोरों ने सोचा कि बिना मेहनत के जो भी मिल जाए उसमें क्या बुराई है । और यह कहते हुए उन्होंने उस अभाव को अपने पास रख लिया । तभी से सभी चोरों के पास वह अभाव स्थायी रूप से रहता है ।

अतः चोरी करने से सदा अभाव की स्थिति व चोरी न करने से सदा सम्पन्नता की स्थिति बनती है ।

इसलिए महर्षि पतंजलि ने चोरी के भाव से मुक्त होने पर सभी उत्तम से उत्तम पदार्थों की प्राप्ति की बात कही है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanku sir we learn a lot through this story ??

  2. Anshu

    प्रणाम आचार्य जी! Nicely explain with a smiling story.

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    उदाहरण सहित कितनी सुंदर व्याख्या की है आपने।

    सत्य है कि यदि कोई व्यक्ति चोरी करता रहता है तो उसके जीवन में हमेशा अभाव ही बना रहता है , इसके विपरीत यदि वह इस भावना को त्याग दे तो उसके पास समस्त प्रकार के वैभव स्वत: उत्पन्न हो जाते हैं।

  4. Ravi Sharma

    Very nicely explained

  5. aashish malhan

    We will obey asatya in all unfavourable condition guru ji.

  6. Anju siwach

    Thank you sir

  7. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir??! Really very nicely explained