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Yog Darshan

Yog Sutra 4 - 9

अध्याय 4: कैवल्यपाद

मूल सूत्र · 4.9

जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ।। 9 ।।

शब्दार्थ

जाति ( विशेष समूह ) देश ( स्थान ) काल ( समय के ) व्यहितानाम् ( व्यवधान या अन्तर होने पर ) अपि ( भी ) स्मृति ( याददाश्त और ) संस्कारयो: ( कर्म संस्कारों के ) एकरूपत्वात् ( एक समान या एक ही विषय होने से ) आनन्तर्यम् ( कोई व्यवधान नहीं होता )

सूत्रार्थ

किसी विशेष जाति समूह, स्थान, व समय में अन्तर होने पर भी याददाश्त और कर्म संस्कारों के एक समान विषय होने से उनमें कोई अन्तर उत्पन्न नहीं होता ।

व्याख्या

इस सूत्र में स्मृति व संस्कारों की एकरूपता के परिणाम को बताया गया है ।

कोई भी जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार ही अगला जन्म लेती है । वह जन्म कर्मों की भिन्नता से उसका जन्म भी अलग- अलग प्रकार के जाति समूहों में होता है । जैसे- अच्छे कर्म करने पर जीव को उच्च कुल में जन्म मिलता है । साधारण कर्म करने पर उसका जन्म साधारण घर में होता है । वहीं अशुभ अर्थात बुरे कर्म करने पर उसे पशु- पक्षियों की योनि में जन्म मिलता है ।

इस प्रकार अलग- अलग जाति समूहों में जन्म लेने पर भी उसकी वैसी ही याददाश्त व कर्म संस्कार बनते रहते हैं । जो बीज अथवा सूक्ष्म रूप में उसके साथ ही अलगे जन्म में भी साथ चले जाते हैं ।

जैसे- कोई जीवात्मा आज पशु योनि में जन्म लेता है तो उसमें वैसे ही संस्कार पहले से ही मौजूद होते हैं । क्योंकि वह पहले कभी न कभी उस योनि में जन्म ले चुका होता है । जिस प्रकार गाय का बछड़ा पैदा होते ही सबसे पहले गाय का दूध पीने के लिए गाय के स्तनों की ओर चल पड़ता है । क्योंकि उसके अन्दर पूर्व जन्म की स्मृति व संस्कारों के सूक्ष्म रूप से मौजूद होने के कारण उसे पता है कि उसे वहाँ से दूध मिलेगा ।

इसी प्रकार कर्म संस्कारों के परिणाम से जीवात्मा अलग- अलग स्थानों में जन्म लेती रहती है । जैसे- कभी जीवात्मा का जन्म भारत देश में हुआ है । तो कभी यूरोप के किसी देश में । इस प्रकार जन्म स्थान में भिन्नता होने पर भी उसके अलग- अलग स्थानों की स्मृति व संस्कार उसके साथ सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते हैं ।

इसके अतिरिक्त जीवात्मा अपने कर्म संस्कारों के परिणाम से अलग- अलग समय में जन्म लेती है । लेकिन पूर्व जन्म की स्मृति वर्षों के अन्तराल के बाद भी बनी रहती है ।

इस प्रकार जीव के अलग- अलग जाति, देश व समय पर जन्म लेने में बहुत सारा अन्तर होने पर भी याददाश्त व कर्म संस्कारों की एकरूपता होने से उनमें किसी प्रकार का अन्तर पैदा नहीं होता । जन्मों जन्म की स्मृति व संस्कारों की एकरूपता के आधार पर जाति समूह, स्थान व समय आदि का अन्तर भी उसमें किसी तरह का कोई व्यवधान नहीं डाल पाता ।

अतः साधक को योग साधना के बल पर अशुभ अर्थात बुरे संस्कारों को नष्ट करके केवल निष्काम कर्म करने चाहिए । ताकि उसका चित्त सभी कर्म संस्कारों से मुक्त हो सके । इस प्रकार कर्म संस्कारों के निर्बल होने से ही साधक को कैवल्य की प्राप्ति होती है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ??प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर वण॔न! धन्यवाद ?

  2. aashish malhan

    Nice example guru ji.

  3. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ?? A real eye opener for all of us on the path of kaivalya. Thank you sir

  4. Lata sudhir baisane

    Dhanyawad.

  5. Rakhi thakur

    Please complit the rest of surta of kaivalya pada THANKS