Yog Darshan
Yog Sutra 4 - 5
अध्याय 4: कैवल्यपाद
मूल सूत्र · 4.5
प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ।। 5 ।।
शब्दार्थ
प्रवृत्तिभेदे ( चित्त को अलग- अलग विषयों या व्यापारों के आधार पर ) अनेकेषाम् ( विभिन्न चित्त व्यापारों का ) प्रयोजकम् ( संचालन अथवा चलाने वाला ) चित्तम् ( वह चित्त ) एकम् ( एक ही है )
सूत्रार्थ
चित्त को विभिन्न विषयों या व्यापारों में लगाने या चलाने वाला वह चित्त मुख्य रूप से एक ही प्रकार का है ।
व्याख्या
इस सूत्र में चित्त के विभिन्न स्वरूपों का आधार एक ही चित्त को माना गया है ।
पिछले सूत्र में चित्त के जिन विभिन्न स्तरों की बात कही गई थी । उन सभी प्रकारों का आधार स्तम्भ एक ही चित्त को माना गया है ।
जिस प्रकार हम सभी अपने जीवन के सभी निर्णय ( फैसले ) बुद्धि द्वारा लेते हैं । उनमें से कुछ निर्णय हमारे लिए लाभदायक होते हैं और कुछ हानिकारक भी होते हैं । लेकिन वह सभी निर्णय लेने वाली बुद्धि तो एक ही होती है । अलग- अलग प्रकार की नहीं । जिस प्रकार अलग- अलग प्रकार के निर्णय लेने वाली वह बुद्धि मुख्य रूप से एक ही प्रकार की होती है । ठीक इसी प्रकार अलग- अलग विषयों या व्यापारों में प्रवृत्त होने वाले चित्त को चलाने वाला चित्त भी एक ही है । यह सभी विषय या व्यापार एक ही चित्त के अधीन होते हैं ।
इसको हम निम्न उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं :-
जिस प्रकार हमारी बुद्धि अलग- अलग परिस्थितियों में अलग- अलग निर्णय लेती है । जिसका मुख्य कारण सत्त्व, रज व तम नामक गुण होते हैं । जब हमारी बुद्धि में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है तो वह सही निर्णय लेती है । लेकिन यदि बुद्धि रजोगुणी है तो वह सही व गलत दोनों ही प्रकार के निर्णय ले सकती है । और यदि बुद्धि में तमोगुण प्रभावी हो तो वह किसी भी प्रकार का निर्णय लेने में समर्थ नहीं होती ।
ठीक इसी प्रकार हमारा चित्त भी सत्त्व, रज व तम नामक गुणों से प्रभावित होता है । जब चित्त में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है तो उसमें एकाग्रता आती है । लेकिन यदि उसमें रजोगुण प्रभावी है तो वह बहुत प्रकार के विषयों में प्रवृत्त होता है । और यदि उसमें तमोगुण का प्रभाव ज्यादा होता है तो वह किसी भी प्रकार के कार्य करने में समर्थ नहीं हो पाता । इसे चित्त की मूढ़ अवस्था कहा जाता है ।
इस प्रकार चित्त का विभिन्न अवस्थाओं वाला होने पर भी उन सभी का संचालन करने वाला चित्त मुख्य रूप से एक ही होता है । अहंकार द्वारा निर्मित चित्त त्रिगुणात्मक ( सत्त्व, रज व तम से युक्त ) होता है । किसी भी एक गुण के बढ़ने से उसकी प्रवृत्ति में भेद होना उसका स्वभाव होता है । लेकिन वह चित्त मूल रूप से एक ही होता है ।
Guru ji thanks nice job
Thank you sir
Dhanyawad.
Guru ji nice explain about chitta.
??प्रणाम आचार्य जी! इस सूत्र मे आपने चित्त के स्वरूप को बहुत ही भलीभांति बताया है ।बहुत सुन्दर! धन्यवाद! ओम! ?
Thanku sir ??