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Yog Darshan

Yog Sutra 4 - 24

अध्याय 4: कैवल्यपाद

मूल सूत्र · 4.24

तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ।। 24 ।।

शब्दार्थ

तद् ( वह अर्थात वह चित्त ) असंख्येय ( अनगिनत या बहुत सारी संख्या में ) वासनाभि ( वासनाओं से ) चित्रम् ( चित्रित या युक्त होते हुए ) अपि ( भी ) परार्थं ( दूसरों अर्थात आत्मा या पुरुष के लिए होता है ) संहत्यकारित्वात् ( सभी के साथ मिलकर काम करने के स्वभाव के कारण )

सूत्रार्थ

वह चित्त अनगिनत वासनाओं से युक्त होते हुए भी दूसरों के लिए अर्थात आत्मा के लिए कार्य करता है । अपने मिलजुलकर कार्य करने वाले स्वभाव के कारण ।

व्याख्या

इस सूत्र में चित्त को आत्मा के लिए कार्य करने वाला बताया गया है ।

यहाँ पर चित्त को दूसरों के लिए कार्य करने वाला बताने के पीछे एक कारण यह भी है कि जो व्यक्ति चित्त को ही सब कुछ मानते हैं । वह इस बात को अच्छी तरह से समझ ले कि जो जड़ पदार्थ होते हैं । वो स्वयं के लिए कुछ भी नहीं करते हैं । उनकी उत्पत्ति तो सदैव दूसरों के लिए ही कार्य करने के लिए होती है ।

चित्त का निर्माण भी सत्त्व, रज व तम नामक गुणों से हुआ है । यह तीनों ही जड़ पदार्थ हैं । इनका कोई भी कार्य स्वयं के लिए नहीं होता । बल्कि इनका प्रयोजन ही परार्थ अर्थात दूसरों के लिए होता है । इसको हम एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझ सकते हैं । जैसे- हम भवन का निर्माण करते हैं तो उसमें ईंटे, सीमेंट, पत्थर, लोहा, लकड़ी व पानी आदि का प्रयोग करते हैं । इन सभी को मिलाकर एक सुन्दर भवन का निर्माण किया जाता है । अब यहाँ पर प्रश्न उठता है कि क्या उस भवन का निर्माण पत्थर, लकड़ी या लोहे के लिए किया गया है ? निश्चित रूप से आपका उत्तर नहीं में ही होगा । क्योंकि भवन का निर्माण हम अपने रहने के लिए करते हैं । ठीक इसी प्रकार बहुत सारी कम्पनियाँ गाड़ी ( कर ) बनाने का काम करती हैं । क्या वह गाड़ियों का निर्माण टायर, सीट, डीजल या सड़क के लिए करती हैं ? इसका उत्तर भी नहीं ही होगा । क्योंकि वह गाड़ियों का निर्माण हमारी सुविधा के लिए करती हैं ।

जिस प्रकार किसी भवन या गाड़ियों का निर्माण उनके स्वयं के लिए नहीं किया जाता । क्योंकि वह भवन या गाड़ी जड़ पदार्थ होने के कारण अपना उपयोग अपने लिए नहीं कर सकते । ठीक उसी प्रकार सत्त्व, रज व तम नामक गुणों से निर्मित इस चित्त ( जड़ पदार्थ ) का निर्माण भी आत्मा के भोग व उसके अपवर्ग के लिए हुआ है । न कि स्वयं के लिए ।

जिस प्रकार उस भवन और गाड़ी का प्रयोग उनका मालिक ( व्यक्ति ) अपने लिए करता है । उसी प्रकार इस चित्त का उपयोग भी आत्मा अपने प्रयोजन सिद्ध करने के लिए करता है ।

इससे यह सिद्ध होता है कि जड़ पदार्थों का निर्माण चेतन द्वारा उपयोग करने के लिए ही हुआ है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ?? Thank you for making Confusing things so easy to understand

  2. Anju siwach

    Thank you sir

  3. Aashish malhan

    Nice example guru ji.

  4. Anshu

    Prnam Aacharya ji! DHNYAVAD OM