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Yog Darshan

Yog Sutra 4 - 11

अध्याय 4: कैवल्यपाद

मूल सूत्र · 4.11

हेतुफलाश्रयालम्बनै: संगृहीतत्वादेषामभावे तदभाव: ।। 11 ।।

शब्दार्थ

हेतु ( कारण ) फल ( परिणाम ) आश्रय ( शरण ) आलम्बनै: ( अभिव्यक्ति से ही ) संगृहीतत्वात् ( वासनाओं का संग्रहण अथवा एक जगह इकट्ठा करना से ) एषाम् ( इन अर्थात उपर्युक्त चार कारणों के ) अभावे ( न होने से अर्थात इन सभी के न रहने से ) तद् ( उन अर्थात उन वासनाओं का ) अभाव ( भी अभाव हो जाता है अर्थात वह वासनाएँ भी नहीं रहती )

सूत्रार्थ

हेतु, फल, आश्रय व आलम्बन से ही वासनाओं का संग्रह होता है । इसलिए इन उपर्युक्त चार कारणों का अभाव होने से अर्थात इनके न रहने से उन सभी वासनाओं का भी अभाव हो जाता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में वासनाओं के संग्रह होने के कारण व उनके समाधान का वर्णन किया गया है ।

एक योग साधक किस प्रकार से अनादि कही जाने वाली वासनाओं का अभाव करके कैवल्य अर्थात मुक्ति को प्राप्त कर सकता है ? इस प्रकार का प्रश्न जब उठता है तो सबसे पहले हमें उन अनादि वासनाओं के कारण को खोजना होगा । तभी हम उसका स्थाई रूप से समाधान कर पाएंगे ।

इस सूत्र में वासनाओं के कारण, परिणाम, आश्रय व उनकी अभिव्यक्ति को बताया गया है । साथ ही यह भी बताया है कि इन सबका अभाव होने से वासनाओं का भी अभाव हो जाता है । अब हम इनकी क्रमशः चर्चा करते हैं :-

  1. हेतु
  2. फल
  3. आश्रय
  4. आलम्बन ।
  1. हेतु :- हेतु का अर्थ होता है कारण । अर्थात वासनाओं की उत्पत्ति का कारण । इन सभी वासनाओं अर्थात कर्म संस्कारों का मूल कारण अविद्या आदि क्लेश होते हैं । जब कोई भी मनुष्य शुभ अर्थात अच्छे कार्य करता है । तब उसे सुख की प्राप्ति होती है । और जब वह अशुभ अर्थात बुरे कार्य करता है । तब उसे दुःखों की प्राप्ति होती है । इस प्रकार सुख के मिलने से व्यक्ति को सुख के प्रति राग उत्पन्न होता है । और दुःख प्राप्त होने पर उसके प्रति द्वेष उत्पन्न होता है । इस प्रकार उसकी कर्म संस्कारों में आसक्ति बनी रहती है ।
  2. फल :- किसी भी परिणाम को फल कहा जाता है । जब भी हम कोई कार्य करते हैं । उसका कुछ न कुछ परिणाम अवश्य ही मिलता है । लेकिन जब हम फल की इच्छा प्राप्ति को उद्देश्य बनाकर कोई कर्म करते हैं । तो उस कर्म का उद्देश्य फल की प्राप्ति करना हो जाता है । फिर चाहे वह शुभ कर्म ही क्यों न हो । इससे भी मनुष्य में कर्म के संस्कार बने रहते हैं । तभी सूत्रकार ने योगियों के लिए निष्काम कर्म को ही उपयुक्त कर्म माना है ।
  3. आश्रय :- आश्रय शब्द का अर्थ होता है शरण देना । जब हम शुभ कर्म करते हैं तो हमारे अन्दर अच्छे संस्कार बनते हैं । और यदि हम अशुभ कर्म करते हैं तो हमारे अन्दर बुरे संस्कार बनते हैं । ये सभी अच्छे व बुरे संस्कार हमारे चित्त में संग्रहित ( इकट्ठे ) होते रहते हैं । संस्कार अच्छे हों या बुरे होते तो आखिर संस्कार ही हैं । जब तक यह संस्कार हमारे चित्त में आश्रय बनाए रखेंगे । तब तक जीव मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता ।
  4. आलम्बन :- आलम्बन का अर्थ है अभिव्यक्ति । अर्थात जो संस्कार चित्त में विद्यमान हैं । उनको संग्रहित या व्यक्त करने का माध्यम आलम्बन कहलाता है । हमारी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से इन सभी संस्कारों का आलम्बन किया जाता है । जैसे- शब्द को सुनना, किसी वस्तु या पदार्थ को स्पर्श करना, किसी पदार्थ के दर्शन करना, किसी द्रव्य के स्वाद को चखना व किसी भी प्रकार की गन्ध को सूँघना आदि ।

ऊपर वर्णित वासनाओं के हेतु, फल, आश्रय व आलम्बन का अभाव कर देने से हमारे सभी कर्म संस्कारों का भी नितान्त अभाव हो जाता है । योग साधना का अभ्यास करके साधक सभी क्लेशों, आसक्ति, चित्त के संस्कारों व उनकी अभिव्यक्ति का अभाव कर सकता है ।

जैसे ही साधक कर्म संस्कारों से मुक्त हो जाता है । वैसे ही उसे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ??प्रणाम आचार्य जी! निष्काम कम॔ योगी बनने की यह सुंदर सीख हम सभी को स्पष्ट भाषा मे देने के लिए हम सब आपके आभारी है ।ओम! ?

  2. Priyanka Atreya

    ??

  3. aashish malhan

    Guru ji nice describe about moksa way to get.

  4. Lata sudhir baisane

    Dhanyawad.