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Yog Darshan

Yog Sutra 3 - 41

अध्याय 3: विभूतिपाद

मूल सूत्र · 3.41

श्रोत्राकाशयो: सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ।। 17 ।।

शब्दार्थ

श्रोत्र ( कान और ) आकाशयो: ( आकाश ) सम्बन्ध ( दोनों के आपसी सम्बन्ध में ) संयमात् ( संयम करने से ) श्रोत्रम् ( दोनों कानों में )      दिव्यं ( दिव्यता अर्थात सूक्ष्म शब्दों को सुनने की क्षमता आती है )

सूत्रार्थ

कानों एवं आकाश के आपसी सम्बन्ध में संयम करने से योगी के दोनों कानों में दिव्यता आ जाती है । जिससे वह सूक्ष्म से सूक्ष्म शब्दों को भी आसानी से सुनने में समर्थ हो जाता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में कानों व आकाश के आपसी सम्बन्ध में संयम करने के फल को बताया है ।

पहले हम श्रोत्र और आकाश को जान लेते हैं । उसके बाद हम इनके आपसी सम्बन्ध व इनकी उपयोगिता को जानेंगे ।

श्रोत्र संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ कान होता है । जिनके द्वारा हम सुनते हैं । यह एक ज्ञानेन्द्रि है । जो हमें सुनने का ज्ञान करवाती है । कुल पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं । जो इस प्रकार हैं - कान, त्वचा, आँख, जिव्हा व नासिका । यदि कान नामक ज्ञानेंद्रि न हो तो हम कुछ भी नहीं सुन सकते । इसलिए जो भी कुछ हम सुन रहे हैं । वह सब कान के माध्यम से सम्भव हो पा रहा है ।

यह तो हुई कानों की बात । अब हम चर्चा करते हैं आकाश की । आकाश हमारे पाँच महाभूतों में से एक है । जो विकास अर्थात उत्पत्ति के क्रम में सबसे पहले आता है । पाँच महाभूत इस प्रकार हैं - आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी ।

जिन शब्दों को हम कानों से सुनते हैं उन सभी का आधार आकाश ही होता है । यदि आकाश नामक महाभूत न हो तो हम कानों के होते हुए भी कोई ध्वनि या शब्द नहीं सुन सकते । छोटी से छोटी व बड़ी से बड़ी सभी प्रकार की ध्वनि अर्थात आवाज का आधार यह आकाश नामक महाभूत ही है ।

अब हम इनकी तन्मात्रा का भी वर्णन करते हैं । आकाश महाभूत की तन्मात्रा शब्द होती है । शब्द का अर्थ है कोई भी अक्षर । जो भी ध्वनि या आवाज हम सुनते हैं । वह एक शब्द ही होता है ।

इसका क्रम इस प्रकार होता है- आकाश, ( महाभूत ) शब्द ( तन्मात्रा ) और कान ( ज्ञानेंद्रि ) ।

हम किसी भी ध्वनि को इन तीनों ( आकाश, शब्द व कान ) के द्वारा ही सुन पाते हैं ।

सूत्र में कहा गया है कि जब योगी आकाश व कान इन दोनों के आपसी सम्बन्ध में संयम कर लेता है तो उसके कान दिव्य शब्दों को सुनने में समर्थ ( योग्य ) हो जाते हैं । यहाँ दिव्यता का अर्थ है जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म शब्द होते हैं । जिन्हें सामन्य तौर से नहीं सुना जा सकता । उन सभी प्रकार के शब्दों को कान व आकाश के सम्बंध में संयम करने के बाद आसानी से सुना जा सकता है ।

यह दिव्य शब्द केवल वही मनुष्य सुन सकता है जो अबधिर ( जो बहरा नहीं है  ) होता है । जो व्यक्ति बधिर ( बहरा ) होता है । उसे यह सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।

विशेष

कुछ ध्वनि ऐसी होती हैं जो सामान्य मनुष्य नहीं सुन पाते हैं । लेकिन कुछ पशु व पक्षी उन ध्वनियों को आसानी से सुन लेते हैं । और उसी प्रकार का बर्ताव शुरू कर देते हैं ।

जैसे :-  मानसून आने से पहले पक्षी चहचहाने लगते हैं । भूकम्प आदि के आने से पहले कुत्ते व बिल्लियाँ अजीब प्रकार से बर्ताव करने लगते हैं । सभी पशु व पक्षियों में सूक्ष्म शब्दों को सुनने की क्षमता जन्मजात होती है । लेकिन यह क्षमता मनुष्य में जन्मजात नहीं होती । बल्कि मनुष्य योग साधना द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है ।

इसलिए जो योगी कान व आकाश के सम्बन्ध में संयम कर लेता है । उसको भी यह योग्यता प्राप्त हो जाती है ।

Reader discussion

Comments (10)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Dinesh

    Nice

  2. Arun Dhillon

    Very nice sir, thanks

  3. Anju siwach

    Thank you sir

  4. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ?? Thank you.

  5. YOGESH TIWARI

    Very good discription sirg

  6. aashish malhan

    Guru ji nice explain about benefit of sayama in ears or sky.

  7. Ram mehar nain

    Outstanding explanation sir

    Thanku

  8. Lata sudhir baisane

    Very informative.

    Dhanyawad Sir.

  9. Anshu

    प्रणाम आचार्य जी! आकाश, श्रोत व शब्द की इतनी सुन्दर व्याख्या इस सूत्र के माध्यम से इनके महत्व का ज्ञान कराने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद आचार्य जी! ओम!

  10. Soni

    श्रोत्राकाशयो: सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ।। 17 ।।

    श्रोत्राकाशयो: सम्बन्धसंयमाद् दिव्यं श्रोत्रम् ।। 3.41।।

    Thank you for your Teaching. It is a blessing to have a teacher like you.🙏🙏

    correction on the "3.41" is required