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Yog Darshan

Yog Sutra 3 - 14

अध्याय 3: विभूतिपाद

मूल सूत्र · 3.14

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपातीधर्मी ।। 14 ।।

शब्दार्थ

शान्त ( अतीत या भूतकाल में ) उदित ( वर्तमान में ) अव्यपदेश्य ( भविष्य में ) धर्मानुपाती ( सभी धर्मों में विद्यमान रहने वाला ) धर्मी ( वह धर्मी होता है )

सूत्रार्थ

किसी भी पदार्थ के अतीत, वर्तमान व भविष्य धर्मों में सदा विद्यमान रहने वाला वह धर्मी होता है ।

व्याख्या

इस सूत्र में पदार्थ के मूल तत्त्व अर्थात धर्मी के स्वरूप को बताया गया है ।

धर्म का अर्थ है किसी वस्तु या पदार्थ के गुण अथवा उसकी विशेषताएँ । और धर्मी का अर्थ है उस वस्तु या पदार्थ का आधार या उसका मूल तत्त्व ।

धर्मी अर्थात पदार्थ का मूल तत्त्व उस पदार्थ में सदैव उपस्थित रहता है । धर्मी के न रहने पर तो पदार्थ की सत्ता ही समाप्त हो जाती है ।

यहाँ पर धर्म के तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । जो इस प्रकार हैं -

  1. शान्त
  2. उदित
  3. अव्यपदेश्य ।
  1. शान्त :- जो अपना कार्य पूरा कर चुके हैं, उन्हें शान्त धर्म कहते हैं । अर्थात जो भी वस्तु या पदार्थ अपना- अपना कर्म पूरा करके समाप्त हो चुके हैं । उनको शान्त धर्म कहा जाता है । जैसे- मिट्टी का घड़ा या मिट्टी का मकान जब एक समय के बाद नष्ट हो जाते हैं । तब वह अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाते हैं । ठीक वैसे ही जैसे बर्फ के पिघलने पर उसका वापिस पानी बन जाता है । इन्हें शान्त धर्म कहते हैं ।
  1. उदित :- जो वस्तु या पदार्थ वर्तमान समय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं । वह उदित धर्म कहलाते हैं । अर्थात जिन - जिन पदार्थों का हम उपयोग कर रहे हैं । वह सभी उदित धर्म कहलाते हैं । जैसे - मिट्टी के घड़े व मिट्टी के मकान का प्रयोग करना । या बीज का अंकुरित होकर वृक्ष बन जाना आदि ।
  1. अव्यपदेश्य :- जो वस्तु या पदार्थ अभी प्रयोग में नहीं आए हैं । अथवा जो भविष्य में प्रयोग में आने वाले हैं । उन्हें अव्यपदेश्य धर्म या भविष्य का धर्म कहते हैं । जैसे- ईंट, मकान व घड़ा आदि सभी पदार्थ कारण रूप में पहले से ही मिट्टी में छुपे होते हैं । ठीक वैसे ही जैसे कि किसी बीज में पूरा वृक्ष व बाल्यकाल में जवानी छिपी होती है । उन सभी को अव्यपदेश्य धर्म कहते हैं ।

धर्मी :- धर्मी किसी भी पदार्थ का वह आधार भूत तत्त्व होता है जिसमें उस पदार्थ की सत्ता पाई जाती है । जैसे- मिट्टी धर्मी होता है । उसके अतिरिक्त मिट्टी के सभी रूप उसके अलग- अलग धर्म होते हैं । वह धर्मी पदार्थ की सभी अवस्थाओं में सदैव ( सदा ) विद्यमान रहता है । वह कभी भी नष्ट नहीं होता है । वही उस पदार्थ का आधार होता है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha

    Thanku sir??

  2. Arun Dhillon

    Very nice sir, thanku

  3. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! ?? Thanks for this clear concise and easy explanation

  4. Anju siwach

    Thank you sir

  5. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर वण॔न!?धन्यवाद! ? ?

  6. aashish malhan

    Guru ji nice explain about dharmi.

  7. Bawam

    Dhanyawad Manyawar