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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 3 [61-69] - Mula Bandha

अध्याय 3: मुद्रा

मूलबन्ध विधि वर्णन

मूल श्लोक · 3.61

पार्षि्णभागेन सम्पीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धोऽभिधीयते ।। 61 ।।

भावार्थ

पैर की एड़ी से सीवनी प्रदेश अर्थात् अण्डकोश के नीचे के मूल भाग को दबाकर गुदा का आकुञ्चन करना चाहिए । अब अपान वायु को ऊपर की ओर खींचने की क्रिया को ही मूलबन्ध कहते हैं ।

मूल श्लोक · 3.62

अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धं हि योगिन: ।। 62 ।।

भावार्थ

यह अपान वायु पंच प्राण का ही एक अंग है जिसकी गति सामान्य रूप से नीचे ( गुदा ) की ओर रहती है । उस अपान वायु को बलपूर्वक ऊपर की ओर खींचकर वहीं पर रोकने को योगियों ने मूलबन्ध कहा है ।

मूल श्लोक · 3.63

गुदं पाष्ण् र्या तु सम्पीड्य योनिमाकुञ्चयेद् बलात् । वारं वारं यथा चोर्ध्वं समायाति समीरण: ।। 63 ।।

भावार्थ

एड़ी से गुदा को अच्छी तरह से दबाकर अपान वायु को बार- बार बलपूर्वक ऊपर की ओर खींचने से अपान वायु ऊपर की ओर आ जाती है ।

मूल श्लोक · 3.64

प्राणापानौ नादबिन्दू मूलबन्धेन चैकताम् । गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नात्र संशय: ।। 64 ।।

भावार्थ

मूलबन्ध के सिद्ध होने पर प्राण वायु व अपान वायु और अनाहत नाद व वीर्य इन सभी में एकरूपता आ जाती है अर्थात् इनका आपस में मिलन हो जाता है । जिससे साधक का योग सिद्ध हो जाता है । इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ।

मूल श्लोक · 3.65

अपानप्राणयोरैक्यं क्षयो मूत्रपुरीषयो: । युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ।। 65 ।।

भावार्थ

नियमित रूप से मूलबन्ध का अभ्यास करने से प्राण वायु व अपान वायु में एकरूपता आ जाती है । जिसके फलस्वरूप साधक के शरीर में मल- मूत्र की मात्रा में कमी आ जाती है और वृद्ध व्यक्ति भी युवा हो जाता है ।

मूल श्लोक · 3.66

अपाने ऊर्ध्वगे जाते प्रयाते वह्निमण्डलम् । तदाऽनलशिखा दीर्घा जायते वायुनाऽऽहता ।। 66 ।।

भावार्थ

जब अपान वायु को मूलबन्ध के द्वारा ऊपर की ओर खींचा जाता है तो वह ऊपर की ओर बढ़ने लगती है । जैसे ही वह अपान वायु नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती हुई जठराग्नि तक पहुँचती है तो उस वायु से प्रेरित होकर साधक की जठराग्नि और भी ज्यादा प्रदीप्त ( मजबूत ) हो जाती है ।

मूल श्लोक · 3.67

ततो यातो वह्नयपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् । तेनात्यन्तप्रदीप्तस्तु ज्वलनो देहजस्तथा ।। 67 ।।

भावार्थ

तब जठराग्नि व अपान वायु की अग्नि बढ़ने से वह शरीर में स्थित प्राण को भी उष्ण ( गर्म ) कर देते हैं । जिससे शरीर में भी अग्नि अत्यंत तीव्र रूप से बढ़ती है ।

मूल श्लोक · 3.68

तेन कुण्डलिनी सुप्ता सन्तप्ता सम्प्रबुध्यते । दण्डाहता भुजङ्गीव नि:श्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ।। 68 ।।

भावार्थ

इस प्रकार शरीर में अग्नि के बढ़ने से शरीर में सोई हुई कुण्डलिनी भी जाग्रत अवस्था में आ जाती है । उसके बाद वह उसी प्रकार सीधी हो जाती है जिस प्रकार डण्डे से मार खाने पर सर्प सीधा हो जाता है ।

मूल श्लोक · 3.69

बिलं प्रविष्टेव ततो ब्रह्ननाड्यन्तरं व्रजेत् । तस्मान्नित्यं मूलबन्ध: कर्तव्यो योगिभि: सदा ।। 69 ।।

भावार्थ

अब जब कुण्डलिनी जाग्रत अवस्था में आ गई है तब वह ब्रह्मनाड़ी में ठीक वैसे ही प्रवेश कर जाती है जिस प्रकार सर्प बिल में प्रवेश करता है । अतः योगी साधक को नियमित रूप से मूलबन्ध का अभ्यास करना चाहिए ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Pooja yadav

    Dhanywad guru ji?

  2. Pooja yadav

    Bhut khub ji

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव *

    आपका बहुत बहुत आभार।