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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 3 [4-9]

अध्याय 3: मुद्रा

ब्रह्मनाड़ी / सुषुम्ना नाड़ी के पर्यायवाची शब्द

मूल श्लोक · 3.4

सुषुम्णा शून्यपदवी ब्रह्मरन्ध्र महापथ: । श्मशानं शाम्भवी मध्यमार्गर्श्चेत्येकवाचका: ।। 4 ।।

भावार्थ

सुषुम्ना, शून्यपदवी, ब्रह्मरन्ध्र, महापथ, श्मशान, शाम्भवी और मध्यमार्ग यह सभी ब्रह्मनाड़ी / सुषुम्ना नाड़ी के ही पर्यायवाची शब्द हैं ।

मूल श्लोक · 3.5

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रबोधयितुमीश्वरीम् । ब्रह्मद्वारमुखे सुप्तां मुद्राभ्यासं समाचरेत् ।। 5 ।।

भावार्थ

इसलिए सुषुम्ना नाड़ी के मुख पर सोई हुई कुण्डलिनी को जगाने के लिए साधक को पूर्ण प्रयास के साथ मुद्राओं का अभ्यास करना चाहिए ।

दस मुद्राएं

मूल श्लोक · 3.6

महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खेचरी । उड्डीयान मूलबन्धस्ततो जालन्धरा भिध: ।। 6 ।।

मूल श्लोक · 3.7

करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्ति चालनम् । इदम् हि मुद्रा दशकं जरामरणनाशनम् ।। 7 ।।

भावार्थ

महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, उड्डीयान बन्ध, मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध, विपरीतकरणी, वज्रोली व शक्तिचालन ये दस मुद्राएं हैं । इन मुद्राओं का अभ्यास करने से साधक के सभी रोग नष्ट होते हैं और साथ ही मृत्यु के लिए उत्तरदायी सभी कारण भी नष्ट हो जाते हैं ।

मुद्राओं की उपयोगिता

मूल श्लोक · 3.8

आदिनाथोदितं दिव्यमष्टैश्वर्यप्रदायकम् । वल्लभं सर्वसिद्धानां दुर्लभं मरुतामपि ।। 8 ।।

भावार्थ

आदिनाथ अर्थात भगवान शिव द्वारा उपदेशित यह दस प्रकार की मुद्राएं साधक को आठ प्रकार की दिव्य और ऐश्वर्य से युक्त सिद्धि प्रदान करवाती हैं । यह मुद्राएं सभी सिद्ध योगियों को प्रिय हैं तथा यह देवताओं को भी सहजता से प्राप्त नहीं होती हैं अर्थात उनके लिए यह दुर्लभ हैं ।

मुद्राओं की गोपनीयता

मूल श्लोक · 3.9

गोपनीयं प्रयत्नेन यथा रत्नकरण्डकम् । कस्यचिन्नैव वक्तव्यं कुलस्त्रीसुरतं यथा ।। 9 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार बहुमूल्य रत्नों ( हीरे- मोती ) से भरी पिटारी को छुपाकर रखा जाता है । ठीक उसी प्रकार इन मुद्राओं को भी पूरी तरह से गुप्त रखना चाहिए । अनावश्य लोगों के सामने इनकी चर्चा नहीं करनी चाहिए । जैसे अच्छे कुल अर्थात घर की नारी सम्भोग आदि की चर्चा किसी के साथ नहीं करती ।

विशेष

यहाँ पर मुद्राओं को गुप्त रखने का अभिप्राय यह बिलकुल भी नहीं है कि हमें मुद्राओं का ज्ञान किसी को भी नहीं देना चाहिए । यहाँ पर गुप्त रखने का अर्थ है कि इन मुद्राओं का ज्ञान कभी भी किसी अयोग्य, दुष्ट या गलत व्यक्ति को नहीं देना चाहिए । क्योंकि अयोग्य व्यक्ति इस अमूल्य ज्ञान के महत्त्व को नहीं समझता । जिससे वह इसका उपहास ( मजाक ) उड़ाने का ही काम करेगा । और यदि कोई दुष्ट व गलत व्यक्ति को इसका ज्ञान होता है तो वह इसका दुरुपयोग करने का काम करेगा । इसलिए इन अत्यंत उपयोगी व दिव्य शक्तियों को प्रदान कराने वाली मुद्राओं को गुप्त रखना चाहिए । पहले इस बात का पता लगाना चाहिए कि जिस व्यक्ति को हम यह ज्ञान देने जा रहे हैं । वह इसका पात्र है या नहीं ? जिस प्रकार श्लोक में अच्छे कुल की स्त्री का उदाहरण भी दिया गया है कि वह सम्भोग आदि गुप्त बातों की चर्चा किसी के सामने नहीं करती हैं । ऐसा करने से उनकी छवि व सम्मान दोनों की हानि होती है । तभी इन मुद्राओं को अत्यंत गोपनीय रखने की बात कही है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Rita

    Thanks sir

  2. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  3. Anil kumar

    प्रणाम आचार्य जी,

    बहुत सुन्दर एक्सप्लेसशन…????

  4. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपको हृदय से आभार।

  5. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  6. Aditi

    Thanku guruji????????