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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 3 [44-49]

अध्याय 3: मुद्रा

मूल श्लोक · 3.44

ऊर्ध्वजिह्व: स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति य: । मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ।। 44 ।।

भावार्थ

जो भी योग साधक अपनी जीभ को ऊपर की ओर उठाकर स्वयं को स्थिर करते हुए ऊपर ( व्योमचक्र ) से टपकते हुए अमृत का पान ( पीता ) करता है । वह मात्र पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के ऊपर विजय प्राप्त कर लेता है । इसमें किसी प्रकार का कोई सन्देह नहीं है ।

मूल श्लोक · 3.45

नित्यं सोमकला पूर्णं शरीरं यस्य योगिन: । तक्षकेणापि दष्टस्य विषं तस्य न सर्पति ।। 45 ।।

भावार्थ

जिस योगी साधक का शरीर सदैव उस सोमरूपी अमृत से भरा रहता है । उसका शरीर भयंकर विष के प्रभाव से भी रहित हो जाता है अर्थात् अत्यंत जहरीले सर्प द्वारा काटने पर भी उसके शरीर में जहर नहीं फैलता ।

मूल श्लोक · 3.46

इन्धनानि यथा वह्निस्तैलवर्ति च दीपक: । तथा सोमकलापूर्णं देही देहं न मुञ्चति ।। 46 ।।

भावार्थ

जिस तरह अग्नि इन्धन को छोड़ती, दीपक की लौ तेल से भीगी बत्ती को नहीं छोड़ता । ठीक उसी प्रकार सोमरूपी अमृत से भरे हुए शरीर को आत्मा नहीं छोड़ती अर्थात् वह साधक मृत्यु को जीत लेता है ।

मूल श्लोक · 3.47

गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलघातका: ।। 47 ।।

मूल श्लोक · 3.48

गोशब्देनोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांस भक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ।। 48 ।।

भावार्थ

जो साधक प्रतिदिन गोमांस को खाता है और दैवीसुरा अर्थात अमृत को पीता है । उसे मैं अच्छे कुल का मानता हूँ और अन्य सभी तो कुल का नाश करने वाले होते हैं । यहाँ पर गो शब्द का अर्थ है जीभ और तालु प्रदेश में उसका प्रवेश करने का अर्थ भक्षण ( खाना ) हैं । यह गोमांस भक्षण अर्थात् जिह्वा को तालु प्रदेश में प्रवेश करवाने से साधक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । यह सभी पापों का नाश करता है ।

विशेष

यहाँ इस श्लोक में गोमांस भक्षण शब्द का प्रयोग किया गया है । जिसमें गो शब्द का अर्थ जीभ का पर्यायवाची है और उस जीभ का तालु प्रदेश में प्रवेश करना मास को खाने का पर्यायवाची है । इसका अर्थ गाय का मास खाना बिलकुल भी नहीं है । गाय के मास को योग शास्त्र में निषेध तथा घोर निन्दनीय बताया है ।

मूल श्लोक · 3.49

जिह्वाप्रवेशसम्भूतवह्निनोत्पादित: खलु । चन्द्रात् स्त्रवति य: सार: सा स्यादमरवारुणी ।। 49 ।।

भावार्थ

जब साधक खेचरी मुद्रा का अभ्यास करते हुए अपनी जीभ को तालु प्रदेश में प्रवेश करवाता है तो उससे गर्मी उत्पन्न होती है । उस गर्मी से तालु के मूल भाग में से एक प्रकार का रस निकलता है । जिसे अमर वारुणी अर्थात् मृत्यु पर विजय प्राप्त करवाने वाला अमृत कहा गया है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Pooja yadav

    Thanks sir इस मुद्रा का इतना बड़ा लाभ बताने के लिए।?

  2. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से आभार।