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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 3 [1-3]

अध्याय 3: मुद्रा

कुण्डलिनी का महत्त्व

मूल श्लोक · 3.1

सशैलवनधात्रीणां यथा धारोऽहिनायक: । सर्वेषां योगतन्त्राणां तथा धारो हि कुण्डली ।। 1 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार शेषनाग को वन पर्वतों सहित पूरी पृथ्वी का आधार माना जाता है । ठीक उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति को सभी योग व तन्त्रों का आधार माना जाता है ।

मूल श्लोक · 3.2

सुप्ता गुरुप्रसादेन यदा जागर्ति कुण्डली । तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यन्ते ग्रन्थयोऽपि च ।। 2 ।।

भावार्थ

गुरु की विशेष कृपा या आशीर्वाद से जब साधक की सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति में चेतना आ जाती है अर्थात वह जाग्रत हो जाती है । तब साधक के सभी चक्र व ग्रन्थियाँ भी खुल जाती हैं । अर्थात उनमें भी ऊर्जा का संचार हो जाता है ।

मूल श्लोक · 3.3

प्राणस्य शून्यपदवी तदा राजपथायते । तदा चित्तं निरालम्बं तदा कालस्य वञ्चनम् ।। 3 ।।

भावार्थ

सुषुम्ना नाड़ी प्राण के लिए शून्य अर्थात सुख को देने वाली व प्राण के प्रवाह का मुख्य मार्ग बन जाती है । तब साधक का चित्त आश्रय रहित हो जाता है अर्थात उसमें किसी भी प्रकार की वृत्ति शेष नहीं रहती । और तब न ही उसे मृत्यु का भय रहता है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Rita

    Thankful for this

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से आभार।

  3. Neelam

    Thank you sir

  4. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  5. Sonika

    Thanks sir ji

  6. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ????????

  7. Monika

    They way you teach its just getting stick in mind.. so simple i am just loving yog more..what else to say, more than ‘ Thank you by the bottom of my heart …

  8. rama vats

    बहुत बहुत धन्यवाद गुरु जी