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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 3 [14-18]

अध्याय 3: मुद्रा

विद्वानों द्वारा महामुद्रा की प्रशंसा

मूल श्लोक · 3.14

महाक्लेशादयो दोषा: क्षीयन्ते मरणादय: । महामुद्रां च तेनैव वदन्ति विबुधोत्तमा: ।। 14 ।।

भावार्थ

महामुद्रा करने से महक्लेश रूपी सभी दोष तथा मृत्यु रूपी दुःख भी नष्ट हो जाते हैं । इसीलिए विद्वानों में भी जो श्रेष्ठ हैं उन्होंने इस मुद्रा को महामुद्रा कहा है ।

मूल श्लोक · 3.15

चन्द्राङ्गे तु समभ्यस्य सूर्याङ्गे पुनरभ्यसेत् । यावतुल्या भवेत् संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ।। 15 ।।

भावार्थ

बायीं ओर से ( बायें पैर से )  महामुद्रा का अभ्यास करने के बाद दोबारा इसका दायीं ओर से ( दायें पैर से ) अभ्यास करें । जब दोनों पैरों से इसका एक समान अभ्यास हो जाए तब महामुद्रा के अभ्यास को समाप्त कर दें ।

महामुद्रा के लाभ

मूल श्लोक · 3.16

न हि पथ्यमपथ्यं वा रसा: सर्वेऽपि नीरसा: । अपि भुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यति ।। 16 ।।

भावार्थ

महामुद्रा का अभ्यास करने से साधक की जठराग्नि इतनी प्रबल हो जाती है कि उसके लिए किसी भी प्रकार का भोजन पचने अथवा न पचने वाला नहीं रहता । वह सभी प्रकार के आहार को आसानी से पचा लेता है । बिना रस वाला आहार भी उसके लिए रसयुक्त हो जाता है । इसके अलावा वह भयानक जहर को भी इस प्रकार पचा लेता है जैसे कि वह अमृत हो ।

मूल श्लोक · 3.17

क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्ण पुरोगमा: । तस्य दोषा: क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ।। 17 ।।

भावार्थ

महामुद्रा के अभ्यास से साधक के क्षय ( तपेदिक या टीबी ) कुष्ठ ( चर्म रोग ) कब्ज, गुल्म ( वायु गोला ) अजीर्ण ( अपच ) व इनसे सम्बंधित अन्य कई प्रकार के रोग भी समाप्त हो जाते हैं ।

महामुद्रा की गोपनीयता

मूल श्लोक · 3.18

कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम् । गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ।। 18 ।।

भावार्थ

मनुष्यों को असंख्य सिद्धियाँ प्रदान कराने वाली इस महामुद्रा को पूरे प्रयास के साथ गुप्त रखना चाहिए । इसका वर्णन किसी को भी नहीं करना चाहिए अर्थात चाहे जिसको भी इसका वर्णन नहीं करना चाहिए । इसे गुप्त ही रखना चाहिए ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव*

    आपका हृदय से आभार।