Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 3 [10-13]
अध्याय 3: मुद्रा
अध्याय परिचय
महामुद्रा वर्णन
मूल श्लोक · 3.10
पादमूलेन वामेन योनिं सम्पीड्य दक्षिणम् । प्रसारितं पादं कृत्वां कराभ्यां धारयेद् दृढम् ।। 10 ।।
मूल श्लोक · 3.11
कण्ठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वत: । यथा दण्डहत: सर्पो दण्डाकार: प्रजायते ।। 11 ।।
मूल श्लोक · 3.12
ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुण्डली सहसा भवेत् । तदा सा मरणावस्था जायते द्विपुटाश्रया ।। 12 ।।
भावार्थ
अपने बायें पैर की एड़ी से सीवनी प्रदेश ( योनि ) को दबाकर दूसरे अर्थात दायें पैर को भूमि पर सामने की तरफ फैलाकर उसे दोनों हाथों से मजबूती के साथ पकड़े । अब प्राणवायु को अन्दर भरकर जालन्धर बन्ध लगाएं । जिस प्रकार सर्प डण्डे की चोट खाकर डण्डे की तरह ही सीधा हो जाता है । ठीक उसी प्रकार महामुद्रा करने से कुण्डली शक्ति भी सीधी हो जाती है । ऐसा होने से दोनों नासिकाओं से आने- जाने वाली प्राणवायु की क्रियाशीलता लुप्तप्राय हो जाती है ।
मूल श्लोक · 3.13
तत: शनै: शनैरेव रेचयेन्न तु वेगत: । इयं खलु महामुद्रा महासिद्धै: प्रदर्शिता ।। 13 ।।
भावार्थ
उसके बाद अर्थात महामुद्रा को करने के बाद जालन्धर बन्ध को हटाकर श्वास को धीरे- धीरे बाहर छोड़ना चाहिए । श्वास को छोड़ने में कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए । महासिद्ध योगियों ने इसे महामुद्रा कहते हुए इसका वर्णन किया है ।
Thanku sir??
सर ,धन्यवाद
मूझे एक समस्या का हल चाहिए.
मयूरासन, वातायनासन, बद्धज्ञ्पासन और एक हस्त बद्ध पच्छीमोत्तानासन.
यह आसन योगोपचार में कैसे ऊपयूक्त है.
Thankyou sir ji .bhut hi halpfull h
धन्यवाद।