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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 5 [74-82]

अध्याय 5: प्राणायाम

भस्त्रिका प्राणायाम विधि

मूल श्लोक · 5.74

भस्त्रैव लोहकालाणां यथाक्रमेण सम्भ्रमेत् । तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनै: ।। 74 ।।

मूल श्लोक · 5.75

एवं विंशतिवारं च कृत्वा कुर्याच्च कुम्भकम् । तदन्ते चालयेद्वायुं पूर्वोक्तं च यथाविधि ।। 75 ।।

भावार्थ

जिस प्रकार लोहार की धौकनी बिना रुकें निरन्तर चलती हुई वायु को अन्दर और बाहर लेती व छोड़ती रहती है । ठीक उसी प्रकार साधक को नासिका के दोनों छिद्रों से वायु को धीरे- धीरे लेना व छोड़ना चाहिए ।

इस विधि को लगातार बीस बार करने के बाद कुछ समय तक वायु को अन्दर ही रोककर कुम्भक करना चाहिए । इसके बाद अर्थात् कुम्भक करने के बाद फिर से पहले वाली विधि से ही वायु को लेना व छोड़ना चाहिए ।

विशेष

लोहार की धौकनी की भाँति किस प्राणायाम की क्रिया होती है ? उत्तर है भस्त्रिका प्राणायाम की । भस्त्रिका प्राणायाम में कितने अभ्यास के बाद कुम्भक करना चाहिए ? बीस बार के अभ्यास के बाद ।

भस्त्रिका प्राणायाम ऊष्मा अर्थात् गर्मी बढ़ाने वाला होता है । अतः जिनका बी०पी० हाई ( उच्च रक्तचाप ) रहता हो या किसी को नकसीर ( नाक से खून बहना ) आती हो उसे इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए ।

भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ

मूल श्लोक · 5.76

त्रिवारं साधयेदेनं भस्त्रिकाकुम्भकं सुधी: । न च रोगो न क्लेशश्च आरोग्यं च दिने दिने ।। 76 ।।

भावार्थ

बुद्धिमान साधकों को इस भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास तीन बार करना चाहिए । ऐसा करने से साधक सभी रोगों व क्लेशों से दूर रहता है और उसे दिन-  प्रतिदिन आरोग्यता अर्थात् उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है ।

विशेष

बुद्धिमान साधकों को भस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास दिन में कितनी बार करना चाहिए ? उत्तर है तीन बार । किस प्राणायाम का अभ्यास करने से साधक के क्लेशों का भी नाश हो जाता है या क्लेश दूर हो जाते हैं ? उत्तर है भस्त्रिका प्राणायाम ।

भ्रामरी प्राणायाम वर्णन

मूल श्लोक · 5.77

अर्धरात्रे गते योगी जन्तूनां शब्दवर्जिते । कर्णौपिधाय हस्ताभ्यां कुर्यात् पूरककुम्भकम् ।। 77 ।।

भावार्थ

योगी को आधी रात के बाद अर्थात् रात्रि के तीसरे पहर में जब सभी जीव-  जंतुओं की आवाज आना पूरी तरह बन्द हो जाती हैं । तब दोनों हाथों से अपने दोनों कानों को बन्द करके श्वास को अन्दर भरे और इसके बाद कुछ समय तक कुम्भक अर्थात् उसे अन्दर ही रोके रखे ।

विशेष

किस प्राणायाम का अभ्यास आधी रात के बाद करना चाहिए ? उत्तर है भ्रामरी प्राणायाम । भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास आधी रात के बाद ही क्यों करना चाहिए ? उत्तर है उस समय सभी जीव- जंतुओं की आवाज आना बन्द हो जाती है । जिससे योगी का आसानी से ध्यान लग जाता है ।

भ्रामरी प्राणायाम की सिद्धि के लक्षण

मूल श्लोक · 5.78

श्रृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं शुभम् । प्रथमं झिञ्झीनादं च वंशीनादं तत: परम् ।। 78 ।।

भावार्थ

भ्रामरी प्राणायाम के समय योगी अपने दायें कान से शुभ नाद ( मंगलकारी ध्वनि ) को सुने । इसमें उसे पहले झींगुरों की ध्वनि व उसके बाद वंशी ( बासुंरी ) की ध्वनि सुनाई देती है ।

मूल श्लोक · 5.79

मेघझर्झरभ्रमरी घण्टाकांस्यं तत: परम् । तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुन्दुभि: ।। 79 ।।

भावार्थ

उसके बाद उसे मेघ अर्थात् बादलों के बरसने की ध्वनि, भँवरे की ध्वनि, कांसे के घण्टे के जैसी ध्वनि, तुरी ( तुरई ) भेरी, मृदङ्ग आदि नाद व उसके बाद तासे और नगाड़ों की ध्वनि सुनाई पड़ती है ।

विशेष

सबसे पहले किस कान से नाद सुनाई देता है ? उत्तर है दाहिने कान से । सबसे पहले कौन सा नाद सुनाई पड़ता है ? उत्तर है झींगुरों का । इसके अलावा इन सभी नादों के विषय में पूछा जा सकता है ।

मूल श्लोक · 5.80

एवं नानाविधो नादो जायते नित्यमभ्यासात् । अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनि: ।। 80 ।।

मूल श्लोक · 5.81

ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मन: । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णो: परमं पदम् । एवं च भ्रामरीसिद्धि: समाधि सिद्धि माप्नुयात् ।। 81 ।।

भावार्थ

इस प्रकार साधक को प्रतिदिन इसका अभ्यास करने पर अनेक प्रकार के नाद सुनाई देते हैं । यह नाद उसे अनाहत अर्थात् बिना किसी व्यवधान के सुनाई देते हैं और उनसे उत्पन्न शब्द की जो ध्वनि होती है, उस ध्वनि के अन्तर्गत ( अधीन ) ज्योति होती है और उसी ज्योति के अन्तर्गत हमारा मन होता है ।

यदि हमारा मन उस परमपद विष्णु में लीन हो जाए तो साधक को भ्रामरी की सिद्धि प्राप्त हो जाती है । भ्रामरी की सिद्धि प्राप्त होने पर साधक को वास्तविक समाधि की प्राप्ति हो जाती है ।

विशेष

नाद की ध्वनि को किसके अन्तर्गत माना गया है ? उत्तर है ज्योति के अधीन । मन को किसके अधीन माना जाता है ? उत्तर है ज्योति के । हमारा मन किसके अन्दर लीन होने से हमें समाधि की सिद्धि प्राप्त होती है ? उत्तर है परमपद विष्णु के अन्तर्गत ।

मूल श्लोक · 5.82

जपादष्टगुणं ध्यानं ध्यानादष्टगुणं तप: । तपसोऽष्टगुणं नाद: नादात्परतरं नहि ।। 82 ।।

भावार्थ

जप से आठ गुणा ज्यादा प्रभावी ध्यान होता है । ध्यान से भी आठ गुणा अधिक प्रभावशाली तप होता है । उस तप से भी आठ गुणा ज्यादा प्रभावी नाद होता है । लेकिन उस नाद से ज्यादा प्रभावी अन्य कुछ भी नहीं होता है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Best explain about nada and bastrika dr sahab.

  2. Neelam

    Bahut sunder , thank you sir

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।

  4. Khileshwari

    Thank you sir bhut achhe se. Samajh Aya ,????????

  5. Manisha Garg

    ????????????????????????????????????????????????

    ????कोटि कोटि प्रणाम. और कोटि कोटि धन्यावाद ????????????????