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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 4 [1-5]

अध्याय 4: प्रत्याहार

अध्याय परिचय

  चौथा अध्याय ( प्रत्याहार वर्णन )

चौथे अध्याय में महर्षि घेरण्ड ने प्रत्याहार का वर्णन किया है । प्रत्याहार को इन्होंने योग के चौथे अंग के रूप में माना है । प्रत्याहार के पालन से साधक को धैर्य की प्राप्ति होती है अर्थात् धैर्य को प्रत्याहार का फल बताया गया है ।

मूल श्लोक · 4.1

अथात: सम्प्रवक्ष्यामि प्रत्याहारकमुत्तमम् । यस्य विज्ञानमात्रेण कामादिरिपुनाशनम् ।। 1 ।।

भावार्थ

इसके बाद ( मुद्राओं के बाद ) अब मैं प्रत्याहार के विषय में कहता हूँ । जिसके ज्ञान को जानने मात्र से ही ( केवल जानने से ही ) काम वासना आदि शत्रु नष्ट हो जाते हैं।

विशेष

प्रत्याहार से काम वासना से सम्बंधित सभी विकार नष्ट हो जाते हैं ।

मूल श्लोक · 4.2

यतो यतो मनश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। 2 ।।

भावार्थ

मन की चंचल प्रवृत्ति होने के कारण यह कहीं- कहीं घूमता रहता है । अतः यह चंचल मन जहाँ- जहाँ भी जाता है । उसे वहीं से रोककर सदा अपने वश में अर्थात् अपने नियंत्रण में रखना चाहिए ।

मूल श्लोक · 4.3

पुरस्कारं तिरस्कारं सुश्राव्यं भावमायकम् । मनस्तस्मान्नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। 3 ।।

भावार्थ

सम्मान हो या अपमान, कानों के लिए प्रशंसा ( अच्छा ) हो या निन्दा ( बुरा ), इन सभी से मन को हटाकर अपने नियंत्रण में रखना चाहिए ।

विशेष

सम्मान व अपमान और प्रशंसा व निन्दा दोनों ही अवस्थाओं में अपने को समान रखते हुए अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए । इस श्लोक में कर्ण अर्थात् कान नामक इन्द्री के विषय को बताया गया है ।

मूल श्लोक · 4.4

सुगन्धो वापि दुर्गन्धो घ्राणेषु जायते मन: । तस्मात् प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। 4 ।।

भावार्थ

सुगन्ध हो या दुर्गन्ध नासिका द्वारा दोनों को ही ग्रहण किया जाता है । सुगन्ध व दुर्गन्ध दोनों में ही मन स्वयं ही चला जाता है । अतः मन को वहाँ से हटाकर अपने नियंत्रण में रखना चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में नासिका नामक इन्द्री के विषय को बताया गया है ।

मूल श्लोक · 4.5

मधुराम्लकतिक्तादिरसं गतं यदा मन: । तस्मात् प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ।। 5 ।।

भावार्थ

जब हमारा मन मीठे, खट्टे, तीखे आदि रसों में जाता है । तब उसे वहाँ से भी हटाकर अपने नियंत्रण में रखना चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में जिह्वा ( जीभ )  नामक इन्द्री के विषय को बताया गया है ।

प्रत्याहार के इस पूरे अध्याय में मन को अपने नियंत्रण में रखने की ही बात कही गई है । यह घेरण्ड संहिता का सबसे छोटा अध्याय है । जिसमें कुल पाँच ही श्लोक हैं ।

प्रत्याहार में मन को अपनी इन्द्रियों से विमुख करने का ही उपदेश दिया जाता है । यहाँ पर एक विशेष बात यह है कि इसमें केवल तीन इन्द्रियों ( कान, नाक व जीभ ) के ही विषयों से मन को हटाकर अपने नियंत्रण में रखने का उपदेश दिया गया है । जबकि कुल ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच होती हैं । यहाँ पर त्वचा व आँख के विषय में चर्चा नहीं की गई है । यह विद्वानों के लिए चर्चा का विषय है । परीक्षा की दृष्टि से भी इस प्रकार का प्रश्न पूछा जा सकता है कि प्रत्याहार के प्रकरण में किन - किन ज्ञानेंद्रियों की चर्चा की गई है ? उत्तर है कान, नासिका व जीभ । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि किस- किस ज्ञानेंद्रियों के विषयों की चर्चा नहीं की गई है ? उत्तर है त्वचा व आँख ।

।।

इति चतुर्थोपदेश: समाप्त: ।।

इसी के साथ घेरण्ड संहिता का चौथा  अध्याय ( प्रत्याहार वर्णन ) समाप्त हुआ ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. रोहित कुमार

    बहुत ही सुन्दर वर्णन प्रत्याहार का आपने वर्णन किया है सर।

    ????

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।

  3. Aashish malhan

    Nice dr sombir ji.

  4. Lata baisane

    धन्यवाद।