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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 5 [1-7]

अध्याय 5: प्राणायाम

अध्याय परिचय

पाँचवा अध्याय ( कुम्भक / प्राणायाम वर्णन )

पाँचवें अध्याय में मुख्य रूप से आठ प्रकार के प्राणायामों ( कुम्भकों ) की चर्चा की गई है । प्राणायाम का अभ्यास करने से साधक के शरीर में लघुता अर्थात् हल्कापन आता है । इस अध्याय में प्राणायाम के अतिरिक्त अन्य कई विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है । जिनमें कुछ निम्न हैं - योग करने के लिए उपयुक्त स्थान, कुटिया के लक्षण, काल अर्थात् समय, मिताहार, पथ्य- अपथ्य आहार व नाड़ी शुद्धि आदि ।

मूल श्लोक · 5.1

अथात: सम्प्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य यद्विधिम् । यस्य साधनमात्रेण देवतुल्यो भवेन्नर: ।। 1 ।।

भावार्थ

इसके बाद ( प्रत्याहार के बाद ) अब प्राणायाम की जो विधि है, मैं उसका अच्छी प्रकार से वर्णन करूँगा । जिसकी साधना मात्र ( केवल जिसके अभ्यास ) से ही मनुष्य देवताओं के समान हो जाता है ।

मूल श्लोक · 5.2

आदौ स्थानं तथा कालं मिताहारं तथा परम् । नाड़ीशुद्धिं तत: पश्चात् प्राणायामं च साधयेत् ।। 2 ।।

भावार्थ

साधक पहले स्थान तथा समय उसके बाद मिताहार और फिर नाड़ीशुद्धि को जानकर उनका पालन करे । उसके बाद ही उसे प्राणायाम की साधना का अभ्यास करना चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में प्राणायाम की साधना करने से पहले साधक को कुछ आवश्यक नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया है । जिनको परीक्षा में भी पूछ लिया जाता है कि प्राणायाम की साधना से पूर्व साधक को किन- किन अंगों की साधना करनी चाहिए ? या प्राणायाम से पहले जिन तत्त्वों का अभ्यास आवश्यक होता है, उनका सही क्रम क्या है ? जिसका उत्तर है पहले साधना के लिए उपयुक्त स्थान का निर्णय फिर उपयुक्त समय का निर्णय । इसके बाद मिताहार का पालन और अन्त में साधक को नाड़ीशुद्धि का अभ्यास करना चाहिए । इसके बाद ही उसे प्राणायाम की साधना करनी चाहिए ।

योग साधना के लिए वर्जित स्थान

मूल श्लोक · 5.3

दूरदेशे तथारण्ये राजधान्यां जनान्तिके । योगारम्भं न कुर्वीत कृतश्चेत् सिद्धि न भवेत् ।। 3 ।।

मूल श्लोक · 5.4

अविश्वासं दूरदेशे अरण्ये रक्षिवर्जितम् । लोकारण्ये प्रकाशश्च तस्मात् त्रीणि विवर्जयेत् ।। 4 ।।

भावार्थ

साधक को निम्न स्थानों पर योग के अभ्यास को आरम्भ नहीं करना चाहिए :- कहीं दूर स्थान पर अर्थात् अपने घर से बहुत दूर, जंगल अथवा वन में, बड़े नगरों में अर्थात् भीड़ - भाड़ वाले स्थानों पर जहाँ पर बहुत अधिक लोग रहते हों । इन स्थानों पर योग करने से साधक को कभी भी योग में सिद्धि प्राप्त नहीं होती है ।

दूर देश में अविश्वास का भाव रहता है, जंगल अथवा वन में सुरक्षा की चिन्ता होती है । भीड़- भाड़ वाले स्थान पर बहुत लोगों परिचय करना चाहेंगे । जिससे जनसङ्ग नामक बाधक तत्त्व बढ़ेगा । अतः साधक को कभी भी इन तीनों स्थानों पर योग साधना का अभ्यास नहीं करना चाहिए । यह योग साधना हेतु वर्जित स्थान माने गए हैं ।

विशेष

परीक्षा में इस श्लोक के विषय में पूछा जा सकता है कि साधक को किन- किन स्थानों पर योग के अभ्यास को प्रारम्भ नहीं करना चाहिए ? जिसका उत्तर है दूर देश में, जंगल अथवा वन में, भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र में अर्थात् जहाँ पर बहुत अधिक लोग रहते हों ।

योग करने हेतु उपयुक्त स्थान

मूल श्लोक · 5.5

सुदेशे धार्मिके राज्ये सुभिक्षे निरूपद्रवे । कृत्वा कुटीरं तत्रैकं प्राचीरै: परिवेष्टितम् ।। 5 ।।

मूल श्लोक · 5.6

वापीकूपतडागं च प्राचीरंमध्यवर्ति च । नात्युच्चं नीतिनिम्नं च कुटीरं कीटवर्जितम् ।। 6 ।।

मूल श्लोक · 5.7

सम्यग्गोमयलिप्तं च कुटीरं तत्रनिर्मितम् । एवं स्थानेषु गुप्तेषु प्राणायामं समभ्यसेत् ।। 7 ।।

भावार्थ

योग साधना के लिए उपयुक्त स्थान के विषय में बताते हुए कहा है कि योग साधक को योग साधना का अभ्यास निम्न स्थानों पर करना चाहिए :-  जो स्थान धार्मिक हो अर्थात् जहाँ का राजा नीतिपूर्ण कार्य करता हो, जहाँ पर साधक को आसानी से भिक्षा ( भोजन आदि ) प्राप्त हो सके, जहाँ पर किसी प्रकार के उपद्रव न होते हो अर्थात् जहाँ पर हिंसक आन्दोलन आदि न होते हों । वहाँ पर एक छोटी कुटिया जो चारों तरफ से दीवार से घिरी हुई हो ।

जहाँ पर पानी का कुँआ या तालाब हो, वहाँ की जो भूमि हो वह न तो अधिक ऊँची हो और न ही ज्यादा नीची हो अर्थात् समतल भूमि होनी चाहिए । कुटिया पूरी तरह से कीट- पतंगों ( साँप, बिच्छु आदि ) से बिलकुल रहित होनी चाहिए ।

वह कुटिया अच्छी प्रकार से गोबर ( गाय के गोबर से ) लिपि होनी चाहिए । इस प्रकार से  बने हुए गुप्त अथवा सुरक्षित स्थान पर ही साधक को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए ।

विशेष

परीक्षा में इससे सम्बंधित भी प्रश्न पूछे जा सकते हैं कि साधक को किस प्रकार के स्थान पर प्राणायाम अथवा योग साधना का अभ्यास करना चाहिए ? या योग साधक की कुटिया के क्या लक्षण होते हैं ? जिसका उत्तर है साधक की कुटिया धार्मिक स्थान पर, जहाँ भिक्षा आसानी से मिल सके, जो स्थान दंगो से रहित हो, कुटिया चारों तरफ से दीवार से घिरी हुई हो, अन्दर पानी का कुँआ या तालाब हो, भूमि समतल हो, कीट- पतंगों से रहित हो व अच्छी तरह से गोबर से लिपि हो ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।

  2. Aashish malhan

    Nice guru ji.

  3. Laxmi

    Nic sir