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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [1-5]

अध्याय 3: मुद्रा

अध्याय परिचय

तृतीय अध्याय ( मुद्रा प्रकरण )

घेरण्ड संहिता के तीसरे अध्याय का विषय मुद्रा है । जिसमें ऋषि घेरण्ड ने सिद्धियों की प्राप्ति के लिए पच्चीस मुद्राओं का वर्णन किया है । मुद्रा के फल को बताते हुए कहा है कि मुद्राओं का अभ्यास करने से साधक को स्थिरता प्राप्त होती है ।

मुद्रा वर्णन ( 25 )

मूल श्लोक · 3.1

महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम् । मूलबन्धं महाबन्धं महावेधश्च खेचरी ।। 1 ।।

मूल श्लोक · 3.2

विपरीतकरी योनिर्वज्रोली शक्तिचालिनी । तडागी माण्डुकी मुद्रा शाम्भवी पचंधारणा ।। 2 ।।

मूल श्लोक · 3.3

अश्विनी पाशिनी काकी मातङ्गी च भुजङ्गिनी । पञ्चविंशति मुद्राणि सिद्धदानीह योगिनाम् ।। 3 ।।

भावार्थ

महामुद्रा, नभोमुद्र, उड्डीयान, जालन्धर, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, विपरीतकरणी, योनि, वज्रोली, शक्तिचालिनी, तडांगी, मांडवी, शाम्भवी, पञ्चधारणा ( पार्थिवी धारणा, आम्भसी धारणा, आग्नेयी धारणा, वायवीय धारणा, आकाशी धारणा ), अश्वनी, पाशिनी, काकी, मातङ्गी और भुजंगिनी यह पच्चीस ( 25 ) मुद्राएँ योगियों को सिद्धियाँ प्रदान करवाने वाली हैं ।

विशेष

इस तीसरे अध्याय में ऋषि घेरण्ड ने पच्चीस मुद्राओं का वर्णन किया है । जो साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं । इन मुद्राओं में पाँच प्रकार की धारणाओं का भी वर्णन किया गया है । जो कि मुद्राओं के ही प्रकार हैं । परीक्षा में इससे सम्बंधित भी पूछा जाता है कि घेरण्ड संहिता में कितनी धारणाओं का वर्णन किया गया है ? जिसका उत्तर है पाँच । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि धारणाओं का वर्णन सप्तांग योग अथवा घेरण्ड संहिता के किस अंग में किया गया है ? जिसका उत्तर है योग के तीसरे अंग / तीसरे अध्याय में वर्णित मुद्राओं में । इसके साथ ही मुद्राओं में तीन प्रकार के बन्धों का भी वर्णन किया गया है :- उड्डीयान बन्ध, जालन्धर बन्ध व मूलबन्ध । इन तीनों बन्धों को एक साथ लगाने को महाबन्ध का नाम दिया गया है ।

मुद्राओं का फल

मूल श्लोक · 3.4

मुद्राणां पटलं देवि कथितं तव सन्निधौ । येन विज्ञातमात्रेण सर्वसिद्धि: प्रजायते ।। 4 ।।

भावार्थ

हे देवी! ( यहाँ पर देवी शब्द भगवान शिव की ओर से माता पार्वती के लिए कहा गया है ) मैंने तुम्हारे सम्मुख ( सामने ) जिन मुद्राओं के समूह का वर्णन किया है । इन सभी को केवल जानने मात्र से ही साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।

मुद्राओं की गोपनीयता

मूल श्लोक · 3.5

गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् । प्रीतिदं योगिनाञ्चैव दुर्लभं मरुतामपि ।। 5 ।।

भावार्थ

इन सभी मुद्राओं को पूरी तरह से गोपनीय रखना चाहिए । चाहे जिसको भी इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए । यह मुद्राएँ देवताओं के लिए भी दुर्लभ ( प्राप्त करना कठिन हैं ) हैं । इनके अभ्यास से योगी साधक को आनन्द की प्राप्ति होती है ।

विशेष

यहाँ पर चाहे जिसको भी इनका ज्ञान न देने से अभिप्राय यह है कि इनका ज्ञान हमेशा ही योग्य साधक को देना चाहिए । जो साधक इनका ज्ञान प्राप्त करने के लायक नहीं है । उसे कभी भी इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए । इस प्रकार अयोग्य व्यक्ति को दिया गया ज्ञान कभी भी फलीभूत नहीं होता । अतः योग्य साधक को ही इनका उपदेश देना चाहिए ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ???

  2. Lata sudhir baisane

    धन्यवाद।