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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [94-100]

अध्याय 3: मुद्रा

सभी मुद्राओं का फल

मूल श्लोक · 3.94

इदं तु मुद्रापटलं कथितं चण्ड ते शुभम् । वल्लभं सर्वसिद्धानां जरामरणनाशनम् ।। 94 ।।

भावार्थ

महर्षि घेरण्ड राजा चण्डकापालिक को कहते हैं कि मैंने मुद्राओं के विषय में वर्णन करने वाले अध्याय का वर्णन तुम्हारे सामने किया है । यह सभी मुद्राएँ सभी विद्वानों अथवा सिद्ध पुरुषों को अत्यंत प्रिय होती है । यह सभी मुद्राएँ बुढ़ापे व मृत्यु को दूर करने वाली होती हैं ।

विशेष

इन सभी मुद्राओं को सभी सिद्ध पुरुषों की प्रिय बताया है । साथ ही सभी मुद्राओं से बुढ़ापा व मृत्यु दोनों ही दूर होते हैं ।

मुद्राओं की गोपनीयता

मूल श्लोक · 3.95

शठाय भक्तिहीनाय न देयं यस्य कस्यचित् । गोपनीयं प्रयत्नेन दुर्लभं मरुतामपि ।। 95 ।।

भावार्थ

इन सभी मुद्राओं को अत्यंत गोपनीय बताया गया है । इन मुद्राओं का ज्ञान कभी भी किसी दुष्ट, भक्तिहीन ( भक्ति रहित ), और चाहे जिसे अर्थात् किसी भी अयोग्य व्यक्ति को कभी भी नहीं देना चाहिए ।

विशेष

इन मुद्राओं की गोपनीयता के विषय में पूछा जा सकता है कि किन- किन व्यक्तियों को इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए ? जिसका उत्तर है दुष्ट व्यक्ति, भक्तिहीन या भक्ति रहित व किसी भी अनजान अथवा अयोग्य व्यक्ति को इनका ज्ञान नहीं देना चाहिए ।

मुद्रा के अधिकारी साधक

मूल श्लोक · 3.96

ऋजवे शान्तचित्ताय गुरुभक्तिपराय च । कुलीनाय प्रदातव्यं भोगमुक्तिप्रदायकम् ।। 96 ।।

भावार्थ

विनम्रतापूर्वक व्यवहार करने वाले को, शान्त चित्त वाले को, गुरु भक्त को, अच्छे कुल अर्थात् अच्छे परिवार से सम्बन्ध रखने वालों को ही इन भोग व मुक्ति प्रदान करने वाली मुद्राओं का ज्ञान देना चाहिए ।

विशेष

परीक्षा में पूछा जा सकता है कि मुद्राओं का ज्ञान किन- किन व्यक्तियों को देना चाहिए ? जिसका उत्तर है विनम्र स्वभाव, शान्त चित्त, गुरु भक्त व अच्छे कुल अथवा परिवार वाले व्यक्तियों को ।

सभी मुद्राओं के मुख्य लाभ

मूल श्लोक · 3.97

मुद्राणां पटलं ह्येतत् सर्वव्याधिविनाशकम् । नित्यमभ्यासशीलस्य जठराग्नि विवर्धनम् ।। 97 ।।

मूल श्लोक · 3.98

न तस्य जायते मृत्युर्नास्य जरादिकं तथा । नाग्निजलभयं तस्य वायोरपि कुतो भयम् ।। 98 ।।

मूल श्लोक · 3.99

कास: श्वास: पलीहकुष्ठं श्लेष्मरोगाश्च विंशति: । मुद्राणां साधनाच्चैव विनश्यन्ति न संशय: ।। 99 ।।

मूल श्लोक · 3.100

बहुना किमीहोक्तेन सारं वच्मि च दण्ड ते । नास्ति मद्रासमं किञ्चित् सिद्धिदं क्षितिमण्डले ।। 100 ।।

भावार्थ

यह मुद्राओं का पूरा समूह अर्थात् यह सभी मुद्राएँ सभी रोगों को नष्ट करती हैं । जो साधक इनका नित्यप्रति अभ्यास करता है उसकी जठराग्नि ( पाचन तंत्र मजबूत ) भी प्रदीप्त होती है ।

वह न कभी बूढ़ा होता है और न ही उसकी  कभी मृत्यु होती है । वह कभी भी अग्नि, जल व वायु से भयभीत नहीं होता ।

इन मुद्राओं का अभ्यास करने से खाँसी, अस्थमा, प्लीहा ( धातुओं का मूत्र मार्ग से बहना ), कुष्ठ अर्थात् चर्म रोग और बीस प्रकार के कफ से सम्बंधित रोग निश्चित रूप से नष्ट हो जाते हैं । इसमें किसी तरह का कोई सन्देह नहीं है ।

हे चण्डकापालिक! तुम्हे मैं और अधिक क्या बताऊँ ? मैं तुम्हे इसका सार बताता हूँ कि पूरी पृथ्वी पर इन मुद्राओं के समान सिद्धि प्रदान करवाने वाला अन्य कुछ भी नहीं है ।

विशेष

ऊपर वर्णित सभी श्लोक परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं । अतः विद्यार्थी इन्हें ध्यान से पढ़ें ।

।।

इति तृतीयोपदेश: समाप्त: ।।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Nice. dr sahab

  2. neelam

    very well explaination ,thank you sir