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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [49-60]

अध्याय 3: मुद्रा

शक्तिचालिनी मुद्रा की भूमिका

मूल श्लोक · 3.49

मूलाधारे आत्मशक्ति: कुण्डली परदेवता । शयिता भुजगाकारा सार्द्ध त्रिवल यान्विता ।। 49 ।।

मूल श्लोक · 3.50

यावत् सा निद्रिता देहे तावज्जीव: पशुर्यथा । ज्ञानं न जायते तावत् कोटियोगं समभ्यसेत् ।। 50 ।।

मूल श्लोक · 3.51

उद्घाटयेत् कपाटञ्च यथा कुञ्चिकया हठात् । कुण्डलिन्या: प्रबोधेन ब्रह्मद्वारं प्रभेदयेत् ।। 51 ।।

मूल श्लोक · 3.52

नाभिं संवेष्टय वस्त्रेण न च नग्नो बहिस्थित: । गोपनीयगृहे स्थित्वा शक्तिचालनमभ्यसेत् ।। 52 ।।

भावार्थ

मनुष्य शरीर के मूलाधार चक्र में सर्वश्रेष्ठ देवता के रूप में आत्मा की प्रमुख शक्ति अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति साँप की भाँति साढ़े तीन लपेटे ( जिस प्रकार साँप कुंडली मारकर बैठता है ) लगाकर सोई हुई रहती है ।

जब तक शरीर में कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई रहती है तब तक साधक पशु की भाँति बिना ज्ञान के ही घूमता रहता है । चाहे वह असंख्य योग साधनाओं का अभ्यास करले, लेकिन फिर भी उसे ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है ।

जिस प्रकार ताला लगे हुए दरवाजे को हम चाबी के द्वारा बलपूर्वक खोल देते हैं । ठीक उसी प्रकार कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर हम ब्रह्मग्रन्थि का आसानी से भेदन कर सकते हैं अर्थात् ब्रह्मद्वार को खोल सकते हैं । शक्तिचालन मुद्रा का अभ्यास करने के लिए साधक को अपनी नाभि प्रदेश के ऊपर वस्त्र लपेटना होता है । साधक को यह कार्य न ही तो बाहर खुले स्थान पर करना चाहिए और न ही पूरी तरह से नग्न अर्थात् नंगा होकर करना चाहिए । इसका अभ्यास पूरी तरह से गुप्त स्थान पर रहकर करना चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक के विषय में पूछा जा सकता है कि कुण्डलिनी का स्थान शरीर में कहा पर है ? जिसका उत्तर है मूलाधार चक्र में । इसके अलावा यह भी पूछा जा सकता है कि कुण्डलिनी शक्ति कितने वलयों अर्थात् लपेटों में लिपटी हुई है ? जिसका उत्तर है साढ़े तीन वलयों या लपेटों में । शक्तिचालन मुद्रा में वस्त्र को शरीर के किस अंग पर लपेटा जाता है ? उत्तर है नाभि प्रदेश के ऊपर । वस्त्र को लपेटते हुए अथवा मुद्रा का अभ्यास किस स्थान पर करना चाहिए ? उत्तर है गुप्त स्थान पर ।

शक्तिचालिनी मुद्रा विधि वर्णन

मूल श्लोक · 3.53

वितस्तिप्रमितं दीर्घं विस्तारे चुतुरङ्गुलम् । मृदुलं धवनं सूक्ष्मं वेष्टनाम्बरललक्षणम् । एवमम्बरयुक्तञ्च कटिसूत्रेण योजयेत् ।। 53 ।।

मूल श्लोक · 3.54

भस्मना गात्रं संलिप्य सिद्धासनं समाचरेत् । नासाभ्यां प्राणमाकृष्य अपाने योजयेद् बलात् ।। 54 ।।

मूल श्लोक · 3.55

तावदाकुञ्चयेद्गुह्यं शनैरश्विनिमुद्रया । यावद् गच्छेत् सुषुम्णायां वायु: प्राकाशयेद्धठात् ।। 55 ।।

मूल श्लोक · 3.56

तदा वायुप्रबन्धेन कुम्भिका च भुजङ्गिनी । बद्धश्वासस्ततो भूत्वा उर्ध्वमार्गं प्रपद्यते ।। 56 ।।

भावार्थ

एक विता अर्थात् एक बिलात ( लगभग नौ से बारह इंच लम्बा ) लम्बा व चार अँगुल ( लगभग तीन इंच ) चौड़ाई वाला कोमल और सूक्ष्म अर्थात् बारीक सफेद कपड़े को नाभि के ऊपर लपेटने का चाहिए । यह वस्त्र के लक्षण ( कोमल, बारीक, सफेद व उसकी लम्बाई- चौड़ाई आदि ) बताये गए हैं । ऊपर वर्णित गुणों से युक्त वस्त्र को ही साधक द्वारा अपनी कमर में बाँधना चाहिए ।

इसके बाद साधक अपने शरीर पर भस्म ( गोबर के उपले को जलाने के बाद बचने वाली राख को ) लगाकर सिद्धासन का अभ्यास करना चाहिए । सिद्धासन लगाने के बाद दोनों नासिका छिद्रों से प्राणवायु को शरीर के अन्दर भरते हुए बलपूर्वक उसे अपान वायु के साथ संयुक्त करें अर्थात् मिलायें ( प्राण व अपान को ) ।

अब साधक अश्वनी मुद्रा के द्वारा अपने गुदा प्रदेश व लिङ्ग को तब तक सिकोड़ते रहें । जब तक कि प्राण व अपान वायु दोनों बलपूर्वक सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करके उसको प्रकाशित न करदे अर्थात् जब तक साधक को इस बात का ज्ञान न हो जाये कि वह प्राण व अपान वायु सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर चुकी हैं ।

इसके बाद बाह्यकुम्भक का अभ्यास करते हुए प्राणवायु को बाहर ही रोकें । इससे कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर शरीर में ऊपर की ओर चढ़ने लगती है अर्थात् इससे कुण्डलिनी शक्ति उर्ध्वगामी हो जाती है ।

विशेष

इस श्लोक में दिए गए सभी लक्षण परीक्षा की दृष्टि से काफी उपयोगी हैं । जैसे - शक्तिचालन मुद्रा के लिए वस्त्र के लक्षण क्या होते हैं ? जिसका उत्तर है कोमल, बारीक, सफेद, एक बिता लम्बा व चार अँगुल चौड़ा कपड़ा । शक्तिचालन मुद्रा में किस आसन व किस अन्य मुद्रा का प्रयोग किया जाता है ? जिसका उत्तर है सिद्धासन व योनिमुद्रा ।

शक्तिचालन मुद्रा से योनि मुद्रा की सिद्धि

मूल श्लोक · 3.57

विना शक्तिंचालनेन योनिमुद्रा न सिद्धयति । आदौ चालनमभयस्त योनिमुद्रां सम्भयसेत् ।। 57 ।।

मूल श्लोक · 3.58

इति ते कथितं चण्डकापाले शक्तिचालनम् । गोपनीयं प्रयत्नेन दिने दिने सम्भयसेत् ।। 58 ।।

भावार्थ

शक्तिचालन मुद्रा का अभ्यास किये बिना योनिमुद्रा को सिद्ध नहीं किया जा सकता अर्थात् बिना शक्तिचालन मुद्रा के योनिमुद्रा में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती । इसलिए साधक को पहले शक्तिचालन मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए । उसके बाद योनिमुद्रा को साधना चाहिए ।

अब घेरण्ड ऋषि कहते हैं हे चन्डकापालि! यह शक्तिचालन मुद्रा का ज्ञान था जो मैंने तुम्हें बताया है । इसे अत्यंय गोपनीय रखते हुए प्रीतिदन प्रयत्नपूर्वक इसका अभ्यास करना चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में बताया गया है कि योनिमुद्रा से पहले साधक को शक्तिचालन मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए । शक्तिचालन मुद्रा के सिद्ध होने पर ही योनिमुद्रा सिद्ध होती है । यह भी याद रखने योग्य जानकारी है ।

शक्तिचालन मुद्रा का फल

मूल श्लोक · 3.59

मुद्रेयं परमा गोप्या जरामरणनाशिनी । तस्मादभ्यासनंकार्यं योगिभि: सिद्धिकाङ्क्षिभि: ।। 59 ।।

मूल श्लोक · 3.60

नित्यं योऽभ्यसते योगी सिद्धिस्तस्य करे स्थिता । तस्य विग्रहसिद्धि: स्याद्रोगाणां सङ्क्षयो भवेत् ।। 60 ।।

भावार्थ

शक्तिचालन मुद्रा अत्यंत गोपनीय है । यह बुढ़ापे व मृत्यु का नाश करने वाली होती है । इसलिए जो साधक योग साधना में सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इसका अभ्यास करना चाहिए ।

जो योगी साधक नित्य प्रति इस मुद्रा का अभ्यास करते हैं, सिद्धि सदा उनके हाथ में रहती है । साथ ही उनका अपने शरीर पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है । इसके अलावा साधक के सभी रोगों का नाश भी हो जाता है ।

Reader discussion

Comments (1)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Neelam

    Thank you sir