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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 3 [80-81]

अध्याय 3: मुद्रा

आकाशीय धारणा मुद्रा विधि वर्णन

मूल श्लोक · 3.80

यत् सिन्धौ वरशुद्धवारिसदृशं व्योमं परं भासितं तत्त्वं देवसदाशिवेन सहितं बीजं हकारान्वितम् । प्राणां विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा मोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणा ।। 80 ।।

भावार्थ

इस आकाशीय धारणा मुद्रा का वर्ण अर्थात् रंग सिन्धु नदी के जल जैसा होता है । यह आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है । यह इसका बीजमन्त्र ‘हँ’ अथवा हकार होता है । इसके देवता स्वयं भगवान शिव हैं । शरीर में इसका स्थान कण्ठ कहा जाता है । जिससे इसका चक्र विशुद्धि होता है । प्राणों को शरीर के अन्दर भरकर उन्हें पाँच घटी अर्थात् दो घण्टे तक शरीर के अन्दर ही रोककर रखते हुए चित्त में स्थिर करें । इस प्रकार यह आकाशीय धारणा मुद्रा मोक्ष के द्वार का भेदन करने वाली कही गई है । इसे नभो धारणा भी कहा जाता है ।

विशेष

परीक्षा से सम्बंधित कुछ आवश्यक प्रश्नों का वर्णन इस प्रकार है :- इस धारणा का तत्त्व कौनसा है ? उत्तर है आकाश । इस धारणा का रंग कौनसा कहा गया है ? उत्तर है शुद्ध जल जैसा । इसका बीज अक्षर क्या है ? उत्तर है ‘हँ’ अथवा हकार । इस धारणा का सम्बंध किस चक्र से होता है ? उत्तर है विशुद्धि चक्र । इस मुद्रा का देवता किसे कहा जाता है ? उत्तर है शिव । इस मुद्रा को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ? उत्तर है नभो धारणा मुद्रा । इसे मोक्ष के द्वार का भेदन करने वाली मुद्रा कहा जाता है ।

आकाशीय धारणा मुद्रा का फल

मूल श्लोक · 3.81

आकाशीयधारणां मुद्रां यो वेत्ति सैव योगवित् । न मृत्युर्जायते तस्य प्रलये नाव सीदति ।। 81 ।।

भावार्थ

आकाशीय धारणा मुद्रा को जानने वाले को योग का ज्ञानी अथवा जानकर माना जाता है । उसकी कभी मृत्यु नहीं होती है और वह प्रलय अर्थात् सृष्टि के विनाश के समय भी दुःखी नहीं होता है ।

विशेष

आकाशीय मुद्रा के जानने वाले को ज्ञानी माना जाता है । इसके अलावा उसकी मृत्यु भी नहीं होती और न ही वह प्रलयकाल में दुःखी होता है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Nice guru ji.

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    बहुत सुन्दर व्याख्या।

  3. SITARAM AGRAWAL

    What about BHAIRAV OR BHAIRAVI mudra ?