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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 2 [36-44]

अध्याय 2: आसन

गरुड़ासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.36

जंघोंरुभ्यां धरां पीड्य स्थिरकायो द्विजानुनी । जानूपरि करयुग्मं गरुड़ासनमुच्यते ।। 36 ।।

भावार्थ

दोनों जाँघों व घुटनों से भूमि को दबाते हुए दोनों हाथों घुटनों के ऊपर हाथों को टिकाकर रखना गरुड़ासन कहलाता है ।

विशेष

गरुड़ासन में गरुड़ शब्द का अर्थ गरुड़ नामक पक्षी होता है । जिसे हम इंग्लिश में ईगल व हिन्दी में बाज कहते हैं । लेकिन यहाँ पर गरुड़ासन की जिस विधि का वर्णन किया गया है और जो वर्तमान समय में गरुड़ासन की प्रचलित विधि है । इन दोनों में बहुत अन्तर है ।

वृषासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.37

याम्यगुल्फे पायुमूलं वामभागे पदेतरम् । विपरीतं स्पृशेद् भूमिं वृषासनमिदं भवेत् ।। 37 ।।

भावार्थ

दायें पैर की एड़ी को गुदाद्वार पर रखकर बायें पैर को मोड़ते हुए भूमि पर उसका स्पर्श करें । यह वृषासन कहलाता है ।

शलभासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.38

अधास्य शेते करयुग्मं वक्षे भूमिमवष्टभ्य करयोस्तलाभ्याम् । पादौ च शून्ये च वितस्ति चोर्ध्वंवदन्ति पीठं शलभं मुनीन्द्रा: ।। 38 ।।

भावार्थ

पहले भूमि पर पेट के बल लेटकर दोनों हाथों की हथेलियों को छाती के नीचे जमीन की ओर करें । अब मुख को नीचे की तरफ रखते हुए दोनों पैरों को ऊपर आकाश की ओर लगभग एक बिलात ( 9 से 12 इंच तक ) उठाएं । श्रेष्ठ योगी मुनियों ने इसे शलभासन का नाम दिया है ।

विशेष

शलभासन में शलभ शब्द का अर्थ टिड्डी नामक कीट होता है । जो पीछे से थोड़ा उठा रहता है । इसी कारण इस आसन का नाम शलभासन पड़ा है । यह परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है ।

मकरासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.39

अधास्य शेते हृदयं निधाय भूमौ च पादौ च प्रसार्यमाणौ । शिरे च धृत्वा करदण्डयुग्मे देहाग्निकारं मकरासनं तत् ।। 39 ।।

भावार्थ

हृदय प्रदेश को नीचे रखते हुए पेट के बल लेटकर दोनों पैरों को पीछे की ओर डण्डे की तरह सीधा फैलाएं । इसके बाद दोनों हाथों की हथेलियों पर अपने माथे को रखें । इस स्थिति को मकरासन कहा गया है । इस मकरासन के अभ्यास से साधक की जठराग्नि प्रदीप्त ( तीव्र ) होती है ।

विशेष

मकर का अर्थ होता है मगरमच्छ । जब मगरमच्छ आराम करता है तो वह इसी अवस्था में रहता है साथ ही मगरमच्छ की पाचन शक्ति बहुत अच्छी होती है । इसलिए मगरमच्छ के जैसी अवस्था होने व उस जैसी पाचन शक्ति होने के कारण इसे मकरासन का नाम दिया गया है ।

उष्ट्रासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.40

अधास्य शेते पदयुग्मव्यस्तं पृष्ठे निधायापि धृतं कराभ्याम् । आकुञ्चयेत्सम्यगुदरास्यगाढमौष्ट्रञ्च पीठं योगिनो वदन्ति ।। 40 ।।

भावार्थ

अपने मुख को नीचे ( पीछे की ओर ) करते हुए दोनों पैरों को पीछे की ओर करते हुए अलग- अलग खोलें ।  दोनों हाथों को घुमाते हुए पैरों को पकड़ें । इस अवस्था में पेट को अधिक से अधिक अन्दर की तरफ सिकोड़ें । इस स्थिति को योगीजनों ने उष्ट्रासन कहा है ।

विशेष

उष्ट्रासन में उष्ट्र शब्द का अर्थ ऊँट होता है । ऊँट के समान आकृति होने के कारण इसे उष्ट्रासन कहा जाता है ।

भुजंगासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.41

अङ्गुष्ठनाभिपर्यन्तमधोभूमौ विनिन्यसेत् । करतलाभ्यां धरां धृत्वा ऊर्ध्वंशीर्ष: फणीव हि ।। 41 ।।

मूल श्लोक · 2.42

देहाग्निर्वर्द्धते नित्यं सर्वरोगविनाशनम् । जागर्ति भुजनी देवी भुजंगासनसाधनात् ।। 42 ।।

भावार्थ

दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन में रखकर नाभि तक के शरीर को सिर समेत साँप के समान ( जिस प्रकार साँप अपने फण को उठाता है ) ऊपर की ओर उठाएं । दोनों हाथों के अँगूठे नाभि की ओर अथवा उसके समीप होने चाहिए । इस स्थिति को भुजंगासन कहते हैं । भुजंगासन का अभ्यास करने से साधक की जठराग्नि प्रतिदिन तीव्र होती जाती है । इससे सभी रोग नष्ट हो जाते हैं । इसके अलावा भुजंगासन की साधना करने से भुजंगी देवी ( कुण्डलिनी शक्ति ) जागृत होती है ।

विशेष

भुजंग शब्द का अर्थ साँप होता है । साँप को ही संस्कृत भाषा में भुजंग बोला जाता है । इसमें शरीर की स्थिति साँप की भाँति होने से इसे भुजंगासन कहा जाता है । इसके अभ्यास से साधक की कुण्डलिनी शक्ति भी जागृत होती है । यह परीक्षा की दृष्टि से काफी उपयोगी जानकारी है ।

योगासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.43

उत्तानौ चरणौ कृत्वा संस्थाप्य जानुनोपरि । आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं करयुग्मकम् ।। 43 ।।

मूल श्लोक · 2.44

पूरकैर्वायुमाकृष्य नासाग्रमवलोकयेत् । योगासनं भवेदेतद्योगिनां योगसाधने ।। 44 ।।

भावार्थ

दोनों पैरों के तलवों को ऊपर की ओर करते हुए अपनी जाँघों पर रखें । अब दोनों हाथों की हथेलियों को ऊपर की ओर ( सीधी ) करते हुए पैरों पर रखें । इसके बाद श्वास को शरीर के अन्दर भरकर नासिका के अग्रभाग ( अगले हिस्से ) को देखना चाहिए । योगियों ने इसे योग साधना को साधने ( सफलता दिलाने वाला ) वाला कहते हुए योगासन का नाम दिया है ।

।।

इति द्वितीयोपदेश: समाप्त: ।।

इसी के साथ घेरण्ड संहिता का दूसरा  अध्याय ( आसन वर्णन ) समाप्त हुआ ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Guru ji nice explain.

  2. Lata sudhir baisane

    धन्यवाद।

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    अति सुंदर व्याख्या।

    आपका ह्रदय से आभार।

  4. Nisha Dahiya

    Thanks sir