Gheranda Samhita
Gheranda Samhita Ch. 2 [29-35]
अध्याय 2: आसन
मयूरासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.29
धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्यां तत्कूर्परे स्थापितनाभिपार्श्वम् । उच्चासनो दण्डवदुत्थित: खे मायूरमेतत्प्रवदन्ति पीठम् ।। 29 ।।
भावार्थ
दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर मजबूती के साथ रखते हुए दोनों कोहनियों को नाभि प्रदेश के दोनों तरफ ( दायीं व बायीं ओर ) रखकर पूरे शरीर को दोनों कोहनियों पर डण्डे के समान सीधा उठाकर रखना मयूरासन कहलाता है ।
विशेष
मयूरासन का नामकरण मोर नामक पक्षी पर रखा गया है । जिस प्रकार मोर अपने पूरे शरीर को अपनी कोहनियों पर उठाए रखता है । उसी प्रकार शरीर की स्थिति करने को मयूरासन कहते हैं । मयूरासन से जठराग्नि इतनी तीव्र हो जाती है कि विषाक्त भोजन खाने पर भी वह उसे शीघ्र पचा देता है । इसलिए मयूरासन करने वाले साधक को कभी भी पाचन तंत्र से जुड़ी कोई समस्या नहीं होती । इस आसन को महिलाओं के लिए वर्जित माना जाता है । इसका कारण यह है कि जहाँ पर दोनों कोहनियों को रखा जाता है । वहाँ पर महिलाओं का गर्भाशय स्थित होता है । इसके करने से कई बार महिलाओं को गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है । इसलिए इसे महिलाओं के लिए प्रायः वर्जित माना जाता है ।
ऊपर वर्णित सभी बातें परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी हैं ।
कुक्कुटासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.30
पद्मासनं समासाद्य जानूर्वोन्तरे करौ । कर्पूराभ्यां समासीन उच्चस्थ: कुक्कुटासनम् ।। 30 ।।
भावार्थ
पद्मासन लगाकर अपने दोनों हाथों को पिंडलियों व जाँघों के बीच में से निकालते हुए भूमि पर दोनों हथेलियों को अच्छे से स्थापित करदें । इससे शरीर जमीन से ऊपर उठ जाएगा । इस स्थिति में साधक को ऐसा प्रतीत है कि वह किसी मंच अथवा लकड़ी के स्टूल पर बैठा है । इसे कुक्कुटासन कहते हैं ।
कूर्मासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.31
गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेण समाहितौ । ऋजुकायशिरोग्रीवं कूर्मासनमितीरितम् ।। 31 ।।
भावार्थ
सुखासन में बैठकर अपने दोनों पैरों को उल्टा करके एड़ियों के ऊपर अंडकोशों को रखें । फिर अपने सिर, गर्दन व शरीर को सीधा रखना ( एक सीध में ) कूर्मासन कहलाता है ।
विशेष
कूर्मासन के विषय में पूछा जा सकता है कि कूर्मासन में कूर्म का क्या अर्थ है ? जिसका उत्तर है कछुआ । कछुए को संस्कृत भाषा में कूर्म बोला जाता है । इस आसन में शरीर की स्थिति कछुए के समान हो जाती है । जिसके कारण इसे कूर्मासन कहा जाता है ।
उत्तानकूर्मासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.32
कुक्कुटासनबन्धस्थं कराभ्यां धृतकन्धरम् । पीठं कूर्मवदुत्तानमेतदुत्तानकूर्मकम् ।। 32 ।।
भावार्थ
पहले कुक्कुटासन की स्थिति में बैठें ( कुक्कुटासन की स्थिति के लिए श्लोक संख्या 30 को देखें ) । अब दोनों हाथों से अपने कन्धों अथवा गर्दन को पकड़कर कछुए के समान सीधे लेट जाना उत्तान कूर्मासन कहलाता है ।
उत्तानमण्डूक आसन
मूल श्लोक · 2.33
मण्डूकासनमध्यस्थं कूर्पराभ्यां धृतं शिर: । एतत् भेकवदुत्तानमेतदुत्तान मण्डुकम् ।। 33 ।।
भावार्थ
सर्वप्रथम मण्डूकासन की स्थिति में बैठकर ( मण्डूकासन की स्थिति को जानने के लिए श्लोक संख्या 35 देखें ) दोनों हाथों की हथेलियों से अपने सिर को पकड़ते हुए मेंढक की तरह सीधा लेट जाना उत्तान मण्डूकासन कहलाता है ।
वृक्षासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.34
वामोरुमूलदेशे च याम्यं पादं निधान तु । तिष्ठेत्तु वृक्षवद् भूमौ वृक्षासनमिदं विदुः ।। 34 ।।
भावार्थ
बायें पैर की जँघा पर दायें पैर ( तलवे को ) को स्थापित ( रखकर ) करके भूमि पर पेड़ की भाँति सीधे खड़े रहना वृक्षासन कहलाता है ।
विशेष
वृक्षासन का सम्बंध पेड़ से होता है । जिस प्रकार पेड़ एक ही तने के ऊपर सीधा खड़ा रहता है । ठीक उसी प्रकार शरीर को एक पैर पर स्थिर कर देना वृक्षासन कहलाता है ।
मण्डूकासन वर्णन
मूल श्लोक · 2.35
पृष्ठदेशे पादतलौ अङ्गुष्ठे द्वे च संस्पृशेत् । जानुयुग्मं पुरस्कृत्य साधयेन् मण्डुकासनम् ।। 35 ।।
भावार्थ
दोनों घुटनों को जमीन पर रखते हुए दोनों पैरों के तलवों को पीछे की ओर करें और अँगूठों को जमीन पर टिकाकर रखें । शरीर की इस स्थिति को मण्डूकासन कहते हैं ।
विशेष
मण्डूकासन में मण्डूक शब्द का अर्थ मेंढक होता है । जिसको कई बार परीक्षा में भी पूछ लिया जाता है ।
Depiction of relevant pose will be m helpful .
धन्यवाद।
ॐ गुरुदेव!
आपका हृदय की गहराइयों से परम अभिनंदन।