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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 2 [11-16]

अध्याय 2: आसन

मुक्तासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.11

पायुमूले वामगुल्फं दक्षगुल्फं तथोपरि । समकायशिरोग्रीवं मुक्तासनन्तु सिद्धि दम् ।। 11 ।।

भावार्थ

पैर की बायीं ऐड़ी को गुदाद्वार में लगाकर उसके ऊपर दायें पैर की एड़ी को रखें । सिर व गर्दन को बिना हिलायें बिलकुल सीधी करके बैठना मुक्तासन कहलाता है । यह मुक्तासन साधक को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करता है ।

वज्रासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.12

जंघाभ्यां वज्रवत्कृत्वा गुदपार्श्वे पदावुभौ । वज्रासनं भवेदेतद्योगिनां सिद्धिदायकम् ।। 12 ।।

भावार्थ

दोनों जँघाओं को वज्र के समान मजबूत व स्थिर करके दोनों पैरों के पँजों को गुदा प्रदेश के दोनों ओर समान रूप से रखते हुए बैठना वज्रासन कहलाता है । यह वज्रासन योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाला होता है ।

स्वस्तिकासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.13

जानूर्वोरन्तरे कृत्वा योगी पादतले उभे । ऋजुकाय: समासीन: स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ।। 13 ।।

भावार्थ

दोनों पैरों के तलवों को पिंडलियों व जाँघों के बीच में रखकर ( बायें पैर के तलवे को दायें पैर की पिंडली व जँघा के बीच व दायें पैर के तलवे को बायें पैर की पिंडली व जँघा के बीच में रखें ) तनाव रहित अर्थात् सुखपूर्वक बैठना स्वस्तिकासन कहलाता है ।

सिंहासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.14

गुल्फौ च वृषणस्याधो व्युत्क्रमेणोर्ध्वतां गतौ । चितिमूलौ भूमिसंस्थौ कृत्वा च जानु नोपरि ।। 14 ।।

मूल श्लोक · 2.15

व्यक्तवक्त्रो जलंध्रञ्च नासाग्रमवलोकयेत् । सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ।। 15 ।।

भावार्थ

दोनों पैरों के पँजों को अंडकोशों के नीचे जमीन में रखते हुए ( पँजे नीचे व ऐड़ी ऊपर की ओर ) दोनों घुटनों को जमीन में टिकाएं । इसके बाद के ठीक ऊपर मुहँ को पूरा खोलकर जालन्धर बन्ध लगाते हुए नासिका के अग्रभाग को देखना सिंहासन कहलाता है । सिंहासन का अभ्यास करने से साधक के सभी प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं ।

गोमुखासन वर्णन

मूल श्लोक · 2.16

पादौ च भूमौ संस्थाप्य पृष्ठपार्श्वे निवेशयेत् । स्थिरकायं समासाद्य गोमुखं गोमुखाकृति: ।। 16 ।।

भावार्थ

साधक सर्वप्रथम अपने दोनों पैरों ( पँजों ) को भूमि पर रखकर अपनी पीठ ( नितम्बों ) के दोनों ओर स्थापित करें ( इसमें दोनों घुटने एक - दूसरे को क्रॉस करते हुए एक - दूसरे के ऊपर नीचे रहेंगे ) और शरीर को बिना हिलायें- डुलायें उसी स्थिति में रखें । इस प्रकार शरीर की आकृति गाय के मुख के समान बन जाती है । इसी को गोमुखासन कहा गया है ।

विशेष

गोमुखासन को परीक्षा की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण आसन माना जाता है । इससे सम्बंधित निम्न प्रश्न पूछे जाते हैं :- गोमुखासन में शरीर की आकृति गाय के किस अंग के समान होती है ? जिसका उत्तर है गाय के मुहँ अर्थात् मुख के समान । इसके अतिरिक्त गोमुखासन स्वयं में ही पूरक आसन होता है । इसको एक बार बायें पैर को ऊपर करके और फिर दायें पैर को ऊपर रखकर करने से ही इसको पूरक आसन माना जाता है । अतः इसका कोई विपरीत या पूरक आसन नहीं होता है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Pooja yadav

    Thnx sir

  2. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव !

    अति सुंदर व्याख्या।

    आपको हृदय से आभार।

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. Pardeep juneja

    Sunder

  5. Raj singh

    Apko hriday se naman