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Yog Darshan

Yog Sutra - 50

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.50

तज्ज: संस्कारोंऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ।। 50 ।।

शब्दार्थ

तज्ज, ( उससे उत्पन्न होने वाला ) संस्कार:, ( विचार ) अन्य, ( दूसरे ) संस्कारो, ( विचारों को ) प्रतिबन्धी, ( रोकने वाला होता है । )

सूत्रार्थ

उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न होने वाला संस्कार या विचार अन्य सभी दूसरे व्युत्थान अर्थात परेशान करने वाले संस्कारों या विचारों को रोक देता है ।

व्याख्या

मनुष्य अपने जीवन में जो भी सोचता है, या अनुभव करता है । जितनी घटनाएं उसके जीवन में घटती हैं । वह सब संस्कार रूप में या बीज रूप में हमारे अन्त: करण में समाहित अर्थात वह संग्रहित होती रहती हैं । यही मनुष्य का कर्माशय अर्थात कर्मों का संचय होता है ।

चित्त में उठने वाले कुछ संस्कार या विचार साधना को भंग करने वाले होते हैं । वहीं कुछ संस्कार ऐसे भी होते है जो साधक को समाधि की ओर अग्रसर करते हैं । इस प्रकार के संस्कार जो साधक को समाधिस्थ करते हैं वह ऋतम्भरा प्रज्ञा के जागृत होने पर ही आते हैं । इन संस्कारों के मजबूत होने से जो अन्य बाधा पहुँचाने वाले संस्कार होते हैं उनको यह ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न होने वाला संस्कार रोक देता है ।

कई बार साधक स्वंम को इन संस्कारों के अधीन समझने लगता है । लेकिन वास्तव में यह संस्कार ही हमारे अधीन होते हैं । जब साधक पूरी दृढ़ता व विश्वास से इन अच्छे संस्कारों को ऊपर उठाता है तो बाकी के परेशानी पैदा करने वाले संस्कार स्वंम ही समाप्त हो जाते हैं । यह सब ऋतम्भरा प्रज्ञा के जागृत होने पर स्वंम ही होने लगता है । इसको करना नहीं पड़ता ।

इस प्रकार ऋतम्भरा प्रज्ञा के जागने से हमारा चित्त पूर्ण रूप से निर्मल हो जाता है । और उन सभी संस्कारों को रोकने में समर्थ हो जाता है जो साधना में बाधा उत्पन्न करते हैं ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! Ritambhara Prgya ke mahattav ke is sunder vrnan ke liye Aapka bhut dhanyavad! ?

  2. Nisha

    Sir u made every sutra so easy thanku sir??

  3. Mamta Sangwan

    Thank you Sir

  4. Anju siwach

    Thank you sir

  5. vikas

    Thanks g

  6. aashish

    Accurate benefits of Ritambara pargya guru ji.