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Yog Darshan

Yog Sutra - 10

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.10

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ।। 10 ।।

शब्दार्थ

:- अभाव, ( वंचित होना ) प्रत्यय, ( ज्ञान का ) अवलम्बन, ( ग्रहण करने वाली ) वृत्ति, ( व्यापार ) निद्रा  ( जाग्रत और स्वप्न्न  से रहित अवस्था )

सूत्रार्थ

शरीर की जाग्रत  और स्वप्न्न अवस्थाओं के ज्ञान  से रहित  जो स्थिति होती है। वह निद्रा नामक वृत्ति  कहलाती है।

व्याख्या

:- जीव ( मनुष्य )  की चार  अवस्थाएँ होती है। 1. जाग्रत, 2. स्वप्न्न , 3. सुषुप्ति, 4. तुरीय । प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति को अलग- अलग प्रकार की अनुभूतियाँ  होती हैं। इनका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है:-

  1. जाग्रत :- जिस अवस्था में व्यक्ति अपने ज्ञान और विवेक से सभी कार्यों को पूर्ण करता है । वह जाग्रत अवस्था होती है । इसमें सभी ज्ञानेन्द्रियाँ, ( आँख, कान, आदि ) कर्मेन्द्रियाँ  ( हाथ, पैर आदि ) व मन  सुचारू रूप से कार्य करते हैं । जैसे कि पढ़ना- लिखना, खेलना- कूदना  आदि।
  2. स्वप्न्न :- जिस अवस्था में व्यक्ति की सभी ज्ञानेन्द्रियाँकर्मेन्द्रियाँ  सो जाएँ । और मन सक्रिय रहे । वह जीव की स्वप्न्न अवस्था  होती है । इसमें व्यक्ति का मन लगातार चलता रहता है ।  जिससे हमें भिन्न- भिन्न प्रकार के स्वप्न्नआते रहते हैं ।
  3. सुषुप्ति :- जब व्यक्ति की सभी ज्ञानेन्द्रियाँकर्मेन्द्रियाँ सो जाएँ । और साथ में मन  भी सो जाएँ । यह जीव की  सुषुप्ति अवस्था  होती है ।  इसमें सभी प्रकार के क्रियाकलाप बन्द  हो जाते हैं । और व्यक्ति पूरी तरह से निद्रा  में लीन हो जाता है । यही निद्रा नामक वृत्ति होती है।
  4. तुरीय :- यह जीव की अन्तिम व सबसे ऊँची अवस्था होती है । इसमें वह परमानन्द की अभुभूति करता है । यह पहले की तीनों अवस्थाओं से रहित होती है । इसे ही आत्मा  का वास्तविक स्वरूप कहा गया है ।

निद्रा वृत्ति का क्लिष्ट स्वरूप :-

जब निद्रा के समय व्यक्ति में सत्त्वगुण  का प्रभाव कम हो जाता है ।  और रजोगुण  का प्रभाव बढ़ जाता है । तब वह नींद से उठने के बाद थकान, व तनाव  का अनुभव ( महसूस ) करता है । इस प्रकार वह निद्रा दुःखदायी  होती है । यह निद्रा वृत्ति  का क्लिष्ट  स्वरूप है ।

निद्रा वृत्ति का अक्लिष्ट स्वरूप :-

जब निद्रा के समय व्यक्ति में रजोगुण  का प्रभाव कम हो जाता है । और सत्त्वगुण  का प्रभाव बढ़ जाता है । तब वह नींद से उठने के बाद स्फूर्ति  व ताजगी  का अनुभव करता है । इस प्रकार वह निद्रा  सुखदायी  होती है । यह निद्रा वृत्ति  का अक्लिष्ट  स्वरूप है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. nisha

    Comment… thanku sir for good knowledge that u give us??

  2. Anshu

    Prnam Aacharya ji. .. thank you for this beautiful explanation of the Sutra. ..

  3. Mamta Sangwan

    Sir thanks

  4. Alok Kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव ?

    बहुत सुन्दर व्याख्या की गई है आपके द्वारा ।

    इससे योग से संबंधित सभी जन अत्यंत लाभान्वित होंगे।

    ? आपका बहुत-बहुत आभार।?

  5. Rosan Kumar Adhikari

    Namaskar,

    My Question is :

    why Nidra is treated as vritti in patanjali ??

    should we eliminate and/or reduce the period of Nidra??