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Yog Darshan

Yog Sutra - 15

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.15

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ।। 15 ।।

शब्दार्थ

:- दृष्ट , ( देखे हुए ) आनुश्रविक , ( सुने हुए ) विषय , ( उपभोग की वस्तुओं को )  वितृष्णस्य, ( प्राप्त करने की इच्छा न होना ही ) वशीकार - संज्ञा,  ( पूर्ण नियंत्रण की अवस्था को ही ) वैराग्यम् ( राग का अभाव या वैराग्य कहते हैं । )

सूत्रार्थ

जो भी देखे हुए एवं सुने हुए विषय हैं । उन सबको प्राप्त  ( पाने ) करने की इच्छा का न होना । ऐसे पूर्ण रूप से वश  ( नियंत्रण ) में किए गए चित्त की अवस्था  ( स्थिति ) को ही वैराग्य  कहते हैं ।

व्याख्या

इस सूत्र में विषय ( वस्तु ) को दो भागों में बाँटा गया है - 1 दृष्ट , 2 आनुश्रविक

  1. दृष्ट :- दृष्ट विषय वें होते हैं जिनको हम अपनी आँखों के द्वारा देख रहे होते हैं । जैसे - रूप - रंग, धन - दौलत, स्त्री - पुरुष, सुख - सम्पन्नता , भोग - विलास आदि। इन सभी विषय - वस्तुओं को हम प्रत्यक्ष रूप से भोग  ( इनका उपयोग ) रहे होते हैं।
  1. आनुश्रविक :- आनुश्रविक विषय वें होते हैं । जिनका ज्ञान हमें प्रत्यक्ष रूप से नही बल्कि सुनने  से होता है । इनको हम महापुरुषों  या वेद - शास्त्रों  से सुनते हैं ।

जैसे - स्वर्ग, परमानन्द, सिद्धियाँ, दिव्य रस का पान  आदि । ये सभी हमारे सामने उपलब्ध नहीं होते हैं ।  इनका ज्ञान हमें सुनने  से ही होता है ।

वैराग्य का स्वरूप :- देखी हुई व सुनी हुई वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा  न होना । ऐसे पूर्ण रूप से  वश  में किए गए चित्त  की जो अवस्था होती है । उसे वैराग्य  कहते है । अर्थात भोग की सभी देखी व सुनी जाने वाली वस्तुओं के प्रति पूर्ण से  अलगाव  ( लगाव रहित अवस्था ) होने को वैराग्य कहा गया है ।

जैसे - अत्यंत आकर्षक रूप  ( किसी सुन्दर स्त्री या पुरूष ) को देखकर उसको प्राप्त करने की लालसा न होना । या विरासत  ( पूर्वजों से प्राप्त ) में मिली धन - सम्पदा  अथवा राज्य  ( राज- पाट ) को भोगने  ( पाने ) की इच्छा न होना ही वैराग्य है । जिस प्रकार महात्मा बुद्ध  को अपने राज्यपत्नी, व बच्चे  से वैराग्य  हुआ था । महात्मा बुद्ध  के  पिता राजा  थे । परन्तु वैराग्य भाव  के जाग्रत होने पर ये अपने महल और परिवार को छोड़ कर सन्यासी  बन गए । तभी वह महात्मा बुद्ध  कहलाए । इसे  वैराग्य  का दृष्ट  ( देखे हुए विषय ) स्वरूप कहते हैं ।

ठीक इसी प्रकार जो आनुश्रविक ( सुने हुए विषयों ) के प्रति लालसा समाप्त  होने को वैराग्य का

आनुश्रविकस्वरुप कहते हैं । जैसे - जब किसी महापुरुष  या शास्त्र  के द्वारा हमें पता चले कि योग साधना  करने से बहुत प्रकार की सिद्धियाँ  ( असीमित शक्तियाँ  ) प्राप्त होती हैं । या स्वर्गलोक में जाने पर परमानन्द  व दिव्य रसों  की प्राप्ति होती है । इस प्रकार की दिव्य अनुभूतियों  को सुनकर भी उनको प्राप्त करने की इच्छा न होना वैराग्य  है ।

इस सूत्र में अपर वैराग्य के स्वरूप को बताया गया है ।

Reader discussion

Comments (11)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. nisha

    Comment…thank you sir ??

  2. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji. . Thank you so much for making Pantanjali Sutra so easy with the distinct vocabulary explanation that a common person can understand so well….??

  3. Rammehar nain

    Thanks sir

    Bahut hi sunder or helpful explanation h apki …..

  4. Arun Dhillon

    Very nice explanation.

  5. Ashok CHAUDHARY

    Sir, vitusnsya ka matalb echa n hona

    Matlb echa se pre hona.

    Chit ka l y ho jana, jb chit hi n hi to echa ya anicha kesi ?

    Vairagya, gyan, sidhdhiya, sb chla jata he jb usme dub jate he.

    Echa n hona aesa n hi , mn hi n hi rhta.

    Mn hi mr jana vo hi vairagya.

    Thanks. Ashok chaudhary from Gujarat

  6. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Very simple and easy words used to explain confusing and difficult concept as vairagya.

  7. Alok Kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव*

    बहुत ही अच्छी व्याख्या की है आपने। आपको दृष्ट एवम् अदृष्ट विषयों के बारे में बताने के लिए आपका बहुत _बहुत आभार ।

    Afteral all the best।

  8. Mamta

    Thank you Sir

  9. Mamta

    Thank you Sir

  10. aashish

    Nice example of mahatma budh guru ji and nice explanation of mahatma budh secrifies

  11. Keshob arya

    bairaighya or prathahar same ha