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Yog Darshan

Yog Sutra - 49

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.49

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।। 49 ।।

शब्दार्थ

श्रुत, ( श्रवण अर्थात सुनने से ) अनुमान, ( अंदाजे या अटकल से ) प्रज्ञाभ्याम्, ( उत्पन्न बुद्धि से ) अन्यविषया, ( भिन्न अथवा अलग विषय वाली ) विशेष, ( विशिष्ट ) अर्थत्वात् ( अर्थ या ज्ञान वाली होती है । )

सूत्रार्थ

सुने हुए व अंदाजे या अनुमान से प्राप्त बुद्धि के ज्ञान से अलग विषय का विशिष्ट ज्ञान करवाने वाली बुद्धि ऋतम्भरा बुद्धि होती है ।

व्याख्या

इस सूत्र में ऋतम्भरा बुद्धि व अन्य सामान्य बुद्धि के बीच के अन्तर को दर्शाया गया है । किसी भी वस्तु या पदार्थ की जानकारी या उसका ज्ञान हमें मुख्य रूप से तीन प्रकार से होता है । 1. प्रत्यक्ष प्रमाण से 2. अनुमान प्रमाण से व 3. शब्द प्रमाण से

यहाँ पर शब्द व अनुमान प्रमाण की बात कही गई है । जो ज्ञान हमारी बुद्धि को कुछ सुनने से या उसका अंदाजा लगाने से होता है । उस ज्ञान में किसी प्रकार की कुछ कमी हो सकती है । लेकिन ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात बुद्धि से प्राप्त होने वाला ज्ञान विशिष्ट या उत्कृष्ट होता है । यानी उस ज्ञान में किसी प्रकार की कोई कमी नही होती है ।

जब साधक की ऋतम्भरा प्रज्ञा जागृत होती है तो उसे विशेष ज्ञान की प्राप्ति होती है । यह ज्ञान शब्द प्रमाण व अनुमान प्रमाण से ज्यादा उपयुक्त होता है ।

शब्द प्रमाण व अनुमान प्रमाण को हम एक बार पुनः समझने का प्रयास करते हैं । जो ज्ञान हमें वेद शास्त्रों या ऋषि व गुरुदेव के वचनों से प्राप्त होता है वह शब्द प्रमाण कहलाता है ।

जैसे जीवात्मा को योगाभ्यास से समाधि की प्राप्ति होती है । यह शब्द प्रमाण कहलाता है । इस ज्ञान से हमें समाधि की केवल समान्य जानकारी होती है । विशेष रूप से नहीं । और अनुमान प्रमाण से हम किसी वस्तु या घटना के विषय में कोई अंदाज या अनुमान ही लगा सकते है । और वह अनुमान भी हमें उसका सामान्य रूप से ज्ञान करवाता है । विशेष रूप से नहीं । जैसे हम नदी में पानी के बढ़े हुए स्तर व मैले रंग को देखकर यह अनुमान तो लगा लेते हैं कि पीछे पहाड़ो में कही बारिश हुई है । लेकिन हमें उसकी विशेष जानकारी नहीं होती कि बारिश कितनी हुई, उससे कितना नुकसान या फायदा हुआ है या इस बारिश का प्रभाव कहाँ - कहाँ तक हुआ है आदि ।

इसलिए शब्द व अनुमान प्रमाण से प्राप्त ज्ञान सामान्य प्रकार का होता है । और उससे हमें सामान्य प्रकार का ही ज्ञान हो सकता है । क्योंकि ज्ञान प्राप्ति के दो ही स्वरूप होते हैं एक सामान्य और एक विशेष ।

समान्य में व्यक्ति को साधारण जानकारी होती है जबकि विशेष में उसको विशिष्ट जानकारी होती है ।

अतः जब किसी साधक की ऋतम्भरा प्रज्ञा जागृत हो जाती है तो उसकी बुद्धि विशेष प्रकार का ज्ञान या जानकारी करवाने वाली हो जाती है । जो सामान्य अर्थात सुने हुए या अंदाजा लगाए हुए ज्ञान से बिलकुल अलग होती है । यही इस सूत्र का भाव है ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ?Prnam Aacharya ji! By this Sutra you really made us awaken for right knowledge which emerged from Ritambhara Prgya. Thank you so much for giving such a beautiful explanation! ?

  2. Nisha

    Thanku so much sir??

  3. Mamta Sangwan

    Thank you Sir

  4. vikas

    Thanks g

  5. pawan

    Thanks guru ji..

  6. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Thank you for enlightening our minds.

  7. aashish

    Nice guru ji

  8. Jacky

    बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख है

    आर्यवीर जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद