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Yog Darshan

Yog Sutra - 27

अध्याय 1: समाधिपाद

मूल सूत्र · 1.27

तस्य वाचक: प्रणव: ।। 27 ।।

शब्दार्थ

तस्य, ( उस ईश्वर का ) वाचक:, ( बोला जाने वाला नाम ) प्रणव:, ( ओ३म् / ओम् है । )

सूत्रार्थ

उस ईश्वर  का बोधक  अर्थात ज्ञान करवाने वाला नाम ओ३म् / ओम्  है ।

व्याख्या

इस सूत्र में ईश्वर के वाचक अर्थात बोले जाने वाले ओम्  नाम का वर्णन किया गया है ।

जो शब्द किसी वस्तु  या पदार्थ  के अर्थ का बोध  ( ज्ञान या जानकारी ) करवाता है वह उसका ( वस्तु या पदार्थ का ) वाचक’ कहलाता है । और उस शब्द के द्वारा जिस पदार्थ या वस्तु का ज्ञान  होता है वह ‘वाच्य’ कहलाता है । जैसे - ऋषि शब्द वाचक’ है और गेहुँआ वस्त्रों  को धारण करने वाला, लम्बे बाल  व दाढ़ी  रखने वाला तथा कुटिया  में निवास करने वाला व्यक्ति विशेष उसका ‘वाच्य’ है ।

वाचक उसे कहतें है जिससे किसी व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान  होता है । और वाच्य उसे कहते है जो उस व्यक्ति या वस्तु की ऐसी विशेषताएं  बताए जिससे उस वस्तु या व्यक्ति का ज्ञान स्वतः  ( स्वंम ही ) हो जाए । उपर्युक्त उदाहरण में ऋषि शब्द बोला जाने वाला नाम है । और उसकी वेशभूषा व उसके रहन- सहन से हमें उसके लक्षणों का पता चलता है ।

वाचक ( नाम ) और वाच्य ( नामी ) का सम्बंध ईश्वर की तरह ही अनादि है ।

जैसे - दीपक ( दीये ) और प्रकाश ( उजाले ) का सम्बंध है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    ?प्रणाम आचार्य जी! पतंजलि योगसूत्र के सुन्दर ज्ञान से हमें नित्य अभिसिंचित करने के लिए आपको बारम्बार प्रणाम व धन्यवाद आचार्य जी ! ?

  2. Nisha

    Thanku sir again??

  3. aashish

    Best explanation of vachak and vacha guru ji.