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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 7 [7-8]

अध्याय 7: समाधि

ध्यान योग समाधि वर्णन

मूल श्लोक · 7.7

शाम्भवीं मुद्रिकां कृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत् । बिन्दुब्रह्ममयं दृष्ट्वा मनस्तत्र नियोजयेत् ।। 7 ।।

मूल श्लोक · 7.8

खमध्ये कुरु चात्मानं आत्ममध्ये च खं कुरु । आत्मानं खमयं दृष्ट्वा न किञ्चिदपि बाधते । सदानन्दमयो भूत्वा समाधिस्थो भवेन्नर: ।। 8 ।।

भावार्थ

शाम्भवी मुद्रा का अभ्यास करते हुए साधक को अपनी आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए साथ ही ब्रह्म स्वरूप बिन्दु को देखते हुए वहीं पर अपने मन को केन्द्रित करें ।

अब अपनी आत्मा को आकाश के बीच में व आकाश को आत्मा के बीच में स्थित करें । आत्मा को आकाश के बीच में स्थित करने पर किसी प्रकार की कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती । ऐसा करने पर मनुष्य सदैव समाधि को प्राप्त करके आनन्दमय हो जाता है । यह ध्यान योग समाधि कहलाती है ।

विशेष

शाम्भवी मुद्रा में आत्मा को कहा पर स्थित किया जाता है ? आकाश के मध्य अथवा बीच में ।

Reader discussion

Comments (8)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Sonika

    Thanks sir

  2. Lata baisane

    धन्यवाद।

  3. Aashish malhan

    short explanation about sambhavi mudra dr sahab.

  4. Mamta

    Thanks again sir

  5. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका परम आभार।

  6. Kr Rohit

    Thnx sir

  7. Narendra Kumar Chowdhary

    Dr. Sir repeat Ho Gaya… Kal vala article.

  8. Anshu

    Prnam Acharacle Ji. Nice explanation