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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 1 [23-28]

अध्याय 1: षट्कर्म

प्रक्षालन विधि

मूल श्लोक · 1.23

नाभिमग्ने जले स्थित्वा नाडीशक्तिं विसर्जयेत् । कराभ्यां क्षा लयेन्नाडीं यावन्मलविसर्जनम् ।। 23 ।।

भावार्थ

नाभि तक के गहरे पानी में उत्कटासन में बैठकर अपनी शक्तिनाड़ी ( मलद्वार ) को बाहर की ओर निकालकर दोनों हाथों से उसको अच्छी तरह से तब तक साफ करना चाहिए जब तक कि उसके अन्दर का सारा मल ( अवशिष्ट पदार्थ ) पूरी तरह से साफ न हो जाये ।

विशेष

इस प्रक्षालन विधि को बहिष्कृत धौति के दूसरे प्रकार के रूप में माना जाता है साथ ही इसकी विधि बस्ति क्रिया से मिलती जुलती है । इस विधि का यहाँ पर वर्णन करने का उद्देश्य यही हो सकता है कि जब बहिष्कृत धौति से अन्दर रुकी हुई वायु को डेढ़ घंटे के बाद जब बाहर निकाला जाता है तो उससे अवश्य मलद्वार के पास कुछ मल जमा हो जाता होगा । जिसको साफ करने के लिए यहाँ पर इस क्रिया का करना आवश्यक हो जाता है । इस प्रक्षालन की विधि की गणना धौति के अंग के रूप में नहीं की जाती ।

प्रक्षालन क्रिया लाभ

मूल श्लोक · 1.24

तावत्प्रक्षाल्य नाडीञ्च उदरे वेशयेत्पुनः । इदम्प्रक्षालनं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् । केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ।। 24 ।।

भावार्थ

उसके बाद शक्तिनाड़ी ( मलद्वार ) को साफ करके पुनः शरीर के अन्दर स्थित कर देना चाहिए । यह क्रिया अति गोपनीय होने के कारण इसे देवताओं के लिए भी यह कठिनाई से प्राप्त होने वाली माना जाता है । केवल इसी धौति क्रिया से साधक का शरीर दिव्य शरीर से युक्त हो जाता है ।

मूल श्लोक · 1.25

यामार्द्धं धारणे शक्तिं यावन्न धारयेन्नर: । बहिष्कृत महद्धौतिस्तावच्चैव न जायते ।। 25 ।।

भावार्थ

जब तक मनुष्य आधे प्रहर ( डेढ़ घंटे ) तक वायु को पेट के अन्दर धारण करने के योग्य नहीं हो जाता तब तक वह बहिष्कृत नामक महाधौति को करने में समर्थ नहीं हो सकता अथवा तब तक उसे इस धौति से कोई लाभ नहीं मिलता । अतः पहले साधक को पेट के अन्दर वायु को डेढ़ घंटे तक स्थिर रखने की योग्यता विकसित करनी चाहिए ।

विशेष

इस श्लोक में बहिष्कृत धौति को महाधौति कहकर सम्बोधित किया गया है । परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यन्त उपयोगी हो सकता है । परीक्षा में यह पूछा जा सकता है कि किस धौति की महाधौति कहा गया है ? जिसका उत्तर है बहिष्कृत धौति । अतः विद्यार्थी इसे याद करलें ।

दन्तधौति के प्रकार

मूल श्लोक · 1.26

दन्तमूलं जिह्वामूलं रन्ध्रञ्च कर्णयुग्मयो: । कपालरन्ध्रम्पञ्चैतै: दन्तधौति: विधीयते ।। 26 ।।

भावार्थ

दाँतों के मूल भाग अर्थात् उनकी जड़ों को साफ करना, जिह्वा के मूलभाग की सफाई करना, दोनों कानों के छिद्रों को साफ करना और सिर के अग्र ( ऊपरी ) भाग की शुद्धि करना यह दन्तधौति के पाँच प्रकार बताये गये हैं । जिनको क्रमशः दन्तमूल धौति, जिह्वामूल धौति, कर्णरन्ध्र धौति व कपालरंध्र धौति कहा जाता है ।

विशेष

दन्तधौति के विषय में प्रायः बहुत सारे विद्यार्थियों में एक भ्रम की स्थिति बन जाती है कि दन्तधौति के कितने प्रकार होते हैं ? इसका उत्तर ऋषि घेरण्ड द्वारा इसके श्लोक में ही दिया गया है । जहाँ पर उन्होंने ‘पञ्चैते’ शब्द का प्रयोग किया है । ‘पञ्चैते’ संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है पाँच । अतः यहाँ पर श्लोक में ही उन्होंने इसको स्पष्ट कर दिया है कि दन्तधौति के पाँच प्रकार होते हैं । लेकिन जैसे ही हम इनकी गणना करते हैं तो इनकी संख्या चार ( 4 ) मिलती है । असली भ्रम यहाँ से शुरू होता है । जिसका निवारण दन्तधौति के तीसरे स्थान पर दी गई धौति ( कर्णरन्ध्र धौति ) के ऊपर ध्यान देने मात्र से ही हो जाता है । कर्णरन्ध्र धौति में हमारे दोनों कानों को शामिल किया जाता है । जिससे इनकी संख्या पाँच होती है । वैसे यदि कर्णरन्ध्र धौति को एक मानते हैं तो यह चार ही दिखती हैं । लेकिन कर्णरन्ध्र में दोनों कानों की शुद्धि को शामिल किया गया है । जिससे दन्तधौति संख्या में कुल पाँच प्रकार की होती है । इसी प्रकार विद्यार्थी धौति के जब सभी प्रकारों की संख्या को गिनता है तो वह भी इसी गलती के कारण धौति के प्रकारों की कुल संख्या बारह ( 12 ) बताता है । जबकि वह कर्णरन्ध्र धौति के दूसरे अंग को भी इसमें शामिल करे तो धौति के प्रकारों की वास्तविक संख्या तेरह ( 13 ) होती है ।

दन्तमूल धौति

मूल श्लोक · 1.27

खादिरेण रसेनाथ मृत्तिकया च शुद्धया । मार्जयेद्दन्तमूलञ्च यावत्किल्बिषमाहरेत् ।। 27 ।।

भावार्थ

खदिर ( खैर ) के वृक्ष से निकलने वाले रस व सूखी मिट्टी दोनों को आपस में मिलाकर उनके लेप को दाँतों के मूल भाग पर तब तक रगड़ते रहें जब तक कि दाँतों में लगी हुई गन्दगी ( मल ) पूरी तरह से दूर न हो जाए ।

विशेष

यहाँ पर जिस सूखी मिट्टी की बात कही गई है । वह पूरी तरह से शुद्ध होनी चाहिए । इसके लिए चिकनी पीली मिट्टी का उपयोग करना सबसे उत्तम माना जाता है क्योंकि चिकनी पीली मिट्टी में किसी प्रकार का कोई दोष ( कीटाणु ) नहीं होता । हमें इसके लिए हमेशा एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस मिट्टी का प्रयोग किया जाए । वह मिट्टी सभी प्रकार की कीटनाशक दवाइयों के प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए ।

दन्तमूल धौति लाभ

मूल श्लोक · 1.28

दन्तमूलं परा धौतिर्योगीनां योगसाधने । नित्यं कुर्यात् प्रभाते च दन्तरक्षां च योगवित् । दन्तमूलं धारणादिकार्येषु योगिनां मतम् ।। 28 ।।

भावार्थ

योगी द्वारा की जाने वाली सभी योग साधनाओं में ( धौतियों में ) दन्तमूल धौति को श्रेष्ठ माना गया है । अपने दाँतों की रक्षा के लिए साधक को प्रतिदिन प्रातःकाल ( सुबह- सुबह ) दन्तमूल धौति का अभ्यास करना चाहिए । दन्तमूल धौति को योगियों द्वारा धारणीय कार्यों ( जिनको कार्यों को प्रतिदिन करना चाहिए ) में करने योग्य माना गया है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    अति सुन्दर व्याख्या।

    आपको हृदय से आभार।

  2. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  3. पूष्पा तोंडारे

    बहोतही सूंदरता से विष्लेशन , गूरुजी प्रणाम

  4. Anshu

    ???