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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 1 [60-65]

अध्याय 1: आसन

मिताहार

मूल श्लोक · 1.60

सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जित: । भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मिताहार: स उच्यते ।। 60 ।।

भावार्थ

पूरी तरह से चिकने अर्थात घी आदि से युक्त व मीठे खाद्य पदार्थों ( आहार ) को, पेट का एक चौथाई ( ¼ ) भाग खाली छोड़कर व आत्मा की प्रसन्नता के लिए ग्रहण किये जाने वाले आहार को मिताहार कहते हैं ।

विशेष

इस श्लोक में मिताहार की चर्चा की गई है । मिताहार का अर्थ है आहार का संयम । सभी योग आचार्यों व ऋषियों ने योगी के लिए मिताहार का ही निर्देश किया है । योग में सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक सभी योग साधकों को मिताहार का पालन अवश्य करना चाहिए । बिना मिताहार का पालन किए योग मार्ग में सफलता प्राप्त करना सम्भव नहीं है । इसलिए सभी योगियों ने मिताहार की उपयोगिता की चर्चा अपने ग्रन्थों में की है ।

योग में अपथ्य आहार

मूल श्लोक · 1.61

कट्वम्लतीक्ष्णलवणोष्णहरीतशाकं--- सौवीरतैलतिलसर्षपमद्यमत्स्यान् । अजादिमांसदधितक्रकुलत्थकोल--- पिण्याक हिङ्गुलशुनाद्यमपथ्यमाहु: ।। 61 ।।

भावार्थ

अपथ्य या निषेध आहार :- अपथ्य आहार वह होता है जो साधना में बाधा उत्पन्न करता है । हठप्रदीपिका में अपथ्य अथवा निषेध आहार में निम्न खाद्य पदार्थों को रखा गया है - कड़वा  जैसे करेला, खट्टा जैसे ईमली, तीखा अर्थात कसैला, ज्यादा नमकीन, उष्ण जैसे जायफल, ( जो कि पित्त को बढ़ाता है ) हरी पत्तियों वाले शाक अर्थात हरे पत्ते वाली सब्जियाँ, कांजी, सरसो व तिल आदि का तेल, शराब, मछली व बकरी आदि पशुओं का मांस, दही, मट्ठा ( छाछ ) अर्थात लस्सी, कुलथी, कोल अर्थात काली मिर्च, खली, हींग व लहसुन आदि खाद्य पदार्थों का सेवन योग मार्ग में निषेध माना गया है । अतः इन पदार्थों को अपथ्य कहा गया है ।

मूल श्लोक · 1.62

भोजनमहितं विद्यात् पुनरप्युष्णीकृतं रुक्षम् । अतिलवणमम्लयुक्तं कदशनं शाकोत्कटं वर्ज्यम् ।। 62 ।।

भावार्थ

इसके अतिरिक्त दोबारा से गर्म किया हुआ, ज्यादा रूखा अर्थात सूखा भोजन, अधिक नमक वाला, अधिक खट्टा व दूषित अर्थात खराब हुआ भोजन आदि त्यागने योग्य भोजन हैं । इसलिए इस प्रकार के भोजन को योग साधना के दौरान अहितकर या वर्जित कहा है ।

मूल श्लोक · 1.63

वह्नि स्त्रीपथिसेवानामादौवर्जनमाचरेत् ।। 63 ।।

भावार्थ

इसके अलावा योग साधना को शुरू करने के समय में अर्थात प्रारम्भिक समय में योगी के लिए अग्नि का सेवन, स्त्री का साथ व लम्बी दूरी की यात्रा वर्जित होती हैं । अर्थात योगी को इन सबके सेवन से बचना चाहिए ।

विशेष

योग साधना को शुरू करने के समय साधक को कुछ ज्यादा ही सावधानियों का पालन करना पड़ता है । अतः यहाँ पर अग्नि सेवन, स्त्री संग व लम्बी यात्रा से दूरी बनाने की बात कही गई है ।

योगी के लिए पथ्य आहार · गोधूमशालियवषष्टिकशोभनान्नाम्

मूल श्लोक · 1.64

क्षीराज्यखण्ड नवनीतसितामधूनि । शुण्ठीपटोलकफलादिकपञ्चशाकं मुद्गादिदिव्यमुदकं च यमीन्द्रपथ्यम् ।। 64 ।।

भावार्थ

पथ्य या हितकर आहार :- पथ्य आहार वह होता है जिसे शरीर शीघ्रता से पचा लेता है । अर्थात शीघ्र हजम होने वाले भोजन को पथ्य कहते हैं । हठप्रदीपिका के अनुसार निम्न खाद्य पदार्थों को पथ्य आहार की श्रेणी में रखा है - गेहूँ, पुराना चावल, जौ, साठी चावल, ( चावल की अन्य किस्म ) क्षीर, ( खीर ) दूध, घी, खाण्ड, मक्खन, शक्कर, शहद, सोंठ, पाँच प्रकार के शाक अर्थात सब्जियाँ ( परवल, लौकी अर्थात घीया, तुरई अर्थात तोरी, कुष्मांड, खीरा ) मूंग व मसूर की दालें व वर्षा का जल अर्थात बारिश का शुद्ध पानी आदि को पथ्य आहार अर्थात शीघ्र पचने वाला आहार कहा है ।

मूल श्लोक · 1.65

पुष्टं सुमधुरं स्निग्धं गव्यं धातु प्रपोषणम् । मनोऽभिलषितं योग्यं योगी भोजनमाचरेत् ।। 65 ।।

भावार्थ

इसके अलावा योगी साधक को पुष्टिकारक, ( जो भोजन शरीर को मजबूत करे ) मधुर स्वाद वाला, ( जिसका स्वाद मीठा व मधुर हो ) स्निग्ध, ( जो घी आदि से बना हुआ हो ) गव्यम, ( गाय के घी व दूध से बने खाद्य पदार्थ ) धातुओं को मजबूत बनाने वाला भोजन, व मन को अच्छा लगने वाले अनुकूल भोजन को ही ग्रहण करना चाहिए । इस प्रकार का आहार पथ्य व हितकारी होता है ।

Reader discussion

Comments (7)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Mamta

    Thanks again sir

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. ANIL KUMAR CHANDRAKAR

    बहुत सुन्दर आचार्य जी, आपके द्वारा हम योगर्थियो तकनीकी माध्यम से निरंतर मार्गदर्शन मिल रहा है…

  5. लक्ष्मी नारायण योग शिक्षक पतंजलि योगपीठ हरिव्दार ।l

    ऊॅ सर जी ! आप के मार्ग दर्शन से अच्छी जानकारियाॅ मिल रही है ।

  6. Pooja yadav

    धन्यवाद sir

  7. Seema

    Very good explained easy to understand