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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 1 [37-40]

अध्याय 1: आसन

सिद्धासन की विधि · योनिस्थानकमन्ध्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेत्

मूल श्लोक · 1.37

मेढ्रे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम् । स्थाणु: संयमितेन्द्रियोऽचलदृशापश्येद् भ्रुवोरन्तरम् ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ।। 37 ।।

भावार्थ

एक पैर की एड़ी को योनिस्थान में ( अण्डकोषों के ठीक नीचे वाले भाग में ) लगाकर दूसरे पैर को शिश्न  के ( लिंग ) ऊपर मजबूती से रखें । इसके बाद अपनी ठुडी को वक्षस्थल अर्थात छाती पर टिकाकर, इन्द्रियों का संयम करते हुए अपनी दोनों आँखों को भ्रुमध्य ( दोनों भौहों ) के बीच में स्थित करें अर्थात वहाँ पर देखें । यह मोक्षद्वार का भेदन करके साधक को मोक्ष प्राप्त करवाने वाला सिद्धासन कहलाता है ।

दूसरे मत के अनुसार सिद्धासन विधि

मूल श्लोक · 1.38

मेढ्रादुपरि विन्यस्य सव्यं गुल्फं तथोपरि । गुल्फान्तरं च निक्षिप्य सिद्धासनमिदं भवेत् ।। 38 ।।

भावार्थ

बायें टखने को लिंग के ऊपरी भाग पर रखकर दूसरे टखने को उसके ऊपर टिकायें । यह स्थिति सिद्धासन कहलाती है ।

विशेष

यहाँ पर दूसरे योगियों के मत के अनुसार सिद्धासन की दूसरी विधि बताई गई है । इससे पहले श्लोक संख्या 37 में गुरु मत्स्येंद्रनाथ द्वारा बताई गई विधि का वर्णन किया गया है ।

सिद्धासन के अन्य नाम

मूल श्लोक · 1.39

एतत् सिद्धासनं प्राहुरन्ये वज्रासनं विदुः । मुक्तासनं वदन्त्येके प्राहुर्गुप्तासनं परे ।। 39 ।।

भावार्थ

ऊपर वर्णित विधियों को सिद्धासन कहते हैं । कुछ योग आचार्य इसे ( सिद्धासन की विधि को ) वज्रासन मानते हैं, कुछ मुक्तासन तो कुछ इसे गुप्तासन कहते हैं ।

विशेष

इस श्लोक में पता चलता है कि सिद्धासन को तीन अन्य नामों से भी जाना जाता है । जो क्रमशः वज्रासन, मुक्तासन व गुप्तासन हैं ।

सिद्धासन की श्रेष्ठता

मूल श्लोक · 1.40

यमेष्विव मिताहार अहिंसा नियमेष्विव । मुख्यं सर्वासनेष्वेकं सिद्धा: सिद्धासनं विदुः ।।

भावार्थ

जिस प्रकार सभी यमों में मिताहार को व नियमों में अहिंसा को श्रेष्ठ माना है । ठीक उसी प्रकार योगियों ने सभी आसनों में सिद्धासन को ही मुख्य अर्थात श्रेष्ठ माना है ।

विशेष

यहाँ पर एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इस श्लोक में यमों में मिताहार को श्रेष्ठ व नियमों में अहिंसा को श्रेष्ठ मानने की बात कही है । यमों के अंतर्गत मिताहार को श्रेष्ठ मानना बिलकुल सही है । लेकिन अहिंसा को नियमों में श्रेष्ठ कहना न्याय संगत नहीं है क्योंकि अहिंसा को यमों के अंतर्गत रखा गया है । नियमों में अहिंसा का वर्णन ही नहीं किया गया है । यहाँ पर इस श्लोक की विश्वसनीयता पर सन्देह होता है ।

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इस ग्रन्थ को लिखने में सभी लेखक एकमत नहीं हैं । यदि आप हठप्रदीपिका पर लिखे गए सभी लेखकों के भाष्यों को पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि बहुत सारे भाष्यकारों ने तो इसमें यम व नियम को माना ही नहीं है । लेकिन वहीं हम यू० जी० सी० नेट व क्यू० सी० आई० सिलेबस में देखें तो हठप्रदीपिका के अनुसार यम व नियम को पूछा जाता है । इससे इसके यम व नियम से सम्बंधित बात को प्रमाणिकता मिलती है ।

उपर्युक्त कारण से हम इस बात से तो सहमत हैं कि हठप्रदीपिका में यम व नियम का वर्णन किया गया है । लेकिन इस श्लोक में अहिंसा को नियम के अंतर्गत मानने वाली बात पर सहमति नहीं हो सकती । क्योंकि अहिंसा को यम के पहले अंग के रूप में माना गया है । नियम में तो इसका कहीं पर वर्णन ही नहीं है ।

दूसरा यदि हम उपनिषदों में जाबालदर्शन उपनिषद को पढ़ते हैं तो उसमें भी दस यम व नियम की बात कही गई है । लेकिन वहाँ पर भी अहिंसा को यम में ही माना गया है । नियम के अंतर्गत नहीं ।

निष्कर्ष

हठयोग के सभी ग्रन्थों, योगदर्शन व उपनिषदों का अध्ययन करने के बाद हमें पता चलता है कि सभी योग आचार्यों ने अहिंसा को यमों के अंतर्गत ही रखा है । यहाँ तक की हठप्रदीपिका में भी अहिंसा को यम में ही माना है । इससे यह सिद्ध होता है कि अहिंसा यम का ही भाग है । न कि नियम का ।

लेकिन हठप्रदीपिका के श्लोक संख्या चालीस ( 40 ) में अहिंसा को नियम में बताया गया है । जो किसी भी प्रकार से तर्कपूर्ण नहीं लगता । अतः हो सकता है इस श्लोक को लिखने में कहीं पर किसी प्रकार की त्रुटि हुई हो । क्योंकि इस श्लोक का कहीं भी अन्य किसी श्लोक के साथ कोई सम्बंध नहीं दिखता । इसलिए यह श्लोक योग के विद्वानों की चर्चा का विषय है । जिस पर एक सकारात्मक चर्चा होनी चाहिए । तभी इसका कोई उचित समाधान निकल सकता है ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Priyanka Atreya

    Pranaam Sir! Your critical analysis helps us to look into the Shloks with a new perspective. Thank you for explaining every minute details.

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. Anshu

    प्रणाम आचार्य जी! सुन्दर सूत्र व्याख्या! धन्यवाद! ओम

  5. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव *

    आपका हृदय से आभार।

  6. V S SHAH

    Guru ji,

    Yam : Ahinsa, satya, Astey, brahmcharya, kshma, Dhriti,daya, Arjavam, Mitahar aur shauch. hai..

    aur sutra 38 k anusaar

    YAM me MITAHAAR aur NIYAM me AHINSA shrestha kese ho sakta hai… jab ke wo dono hi YAM k antargat aate hai..!!!!