Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 1 [31-34]
अध्याय 1: आसन
पश्चिमतान आसन का लाभ
मूल श्लोक · 1.31
इति पश्चिमतान मासनाग्र्यं पवनं पश्चिमवाहिनं करोति । उदरं जठरानलस्य कुर्यादुदरे काश्यमरोगतां च पुंसाम् ।। 31 ।।
भावार्थ
इन सभी आसनों ( इससे पूर्व में जिन आसनों का वर्णन किया गया है ) में पश्चिमत्तान आसन सबसे अग्रणीय या मुख्य आसन है । इसके अभ्यास से साधक का प्राण मेरुदण्ड के मध्य में अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में पहुँचता है । पेट में स्थित जठराग्नि तीव्र अर्थात मजबूत होती है । इसके अतिरिक्त यह आसन पेट की बढ़ी हुई चर्बी को कम करता है । साथ ही शरीर में आरोग्यता आने से साधक निरोगी हो जाता है ।
मयूरासन विधि
मूल श्लोक · 1.32
धरामवष्टभ्य करद्वयेन तत्कूर्परस्थापितनाभिपार्श्व: । उच्चासनो दण्डवदुत्थित: स्यान्मायूरमेतत्प्रवदन्ति पीठम् ।। 32 ।।
भावार्थ
दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर इस प्रकार रखें कि अंगुलियाँ पैरों की तरफ रहें । अब अपनी नाभि के दोनों तरफ अपनी कुहनियों को स्थिर करके शरीर को आगे व पीछे दोनों ही तरफ से डन्डे के समान सीधा करते हुए ऊपर की ओर उठाएं और शरीर को इसी अवस्था में रखें । इस प्रकार शरीर का पूरा भार दोनों कुहनियों पर रखते हुए सन्तुलन बनाने को मयूरासन कहते हैं ।
विशेष
इसमें शरीर की आकृति मोर के समान होने से इसे मयूरासन कहा जाता है ।
मयूरासन के लाभ · हरतिसकलरोगानाशु गुल्मोदरादीन्
मूल श्लोक · 1.33
अभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम् । बहु कदशनभुक्तं भस्मकुर्यादशेषम् जनयति जठराग्निं जारयेत् कालकूटम् ।। 33 ।।
भावार्थ
मयूरासन का अभ्यास करने से पेट में वायु गोला बनना आदि समस्त पेट के रोग शीघ्रता से समाप्त हो जाते हैं । साथ ही यह पेट के अन्य अवशिष्ट पदार्थों को भी दूर करता है । इससे साधक की जठराग्नि इतनी प्रबल हो जाती है कि वह अधिक खाये गए भोजन को भी आसानी से पचा देती है । इसके अलावा अधिक भोजन या अपथ्य भोजन करने से शरीर में बनने वाला महाविष भी इस आसन के प्रभाव से भस्म अर्थात खत्म हो जाता है ।
शवासन की विधि व लाभ
मूल श्लोक · 1.34
उत्तानं शववद् भूमौ शयनं तच्छवासनम् । शवासनं श्रान्तिहरं चित्तविश्रान्तिकारकम् ।।
भावार्थ
छाती व पेट को ऊपर की तरफ रखते हुए भूमि पर शव के समान लेट जाना शवासन कहलाता है । इस अवस्था में शरीर में किसी भी प्रकार की कोई हलचल नहीं होनी चाहिए । शरीर बिलकुल मुर्दे की भाँति शान्त व हलचल रहित होना चाहिए । शवासन करने से शरीर को पूरी तरह से आराम मिलता है । जिससे शरीर की थकान दूर होती है अथवा शारिरिक शान्ति मिलती है । साथ ही चित्त को भी आराम मिलने से मानसिक शान्ति की भी प्राप्ति होती है ।
Thanku sir ??
Sir, You are doing a nice job by educating the yog practitioners and yog teachers with a mix of our ancestors heritage of yoga in modern yoga scenario.
Great sir.
धन्यवाद।
ऊॅ सरजी ।बहुत अच्छे शब्दो मे समझाया आपने धन्यवाद सर ।
Nice explanation bhaiya,,i am trying to do it