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Hatha Pradipika

Hatha Pradipika Ch. 1 [46-50]

अध्याय 1: आसन

पद्मासन की विधि · वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा

मूल श्लोक · 1.46

दक्षोरूपरि, पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् । अङ्गुष्ठौ, हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकयेत् एतद्व्याधिविनाशकारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते ।। 46 ।।

भावार्थ

बायीं जंघा पर दायें पैर को व दायीं जंघा पर बायें पैर को रखें । अब दोनों हाथों को कमर के पीछे से ले जाते हुए दायें हाथ से दायें व बायें हाथ से बायें पैर के अंगूठों को मजबूती से पकड़े । इसके बाद अपनी ठुड्डी को छाती पर लगाकर नासिका के अगले हिस्से को देखें । अतः साधकों के सभी रोगों को नष्ट कर करने वाले इस आसन को पद्मासन कहते हैं ।

पद्मासन दूसरे मत के अनुसार

मूल श्लोक · 1.47

उत्तानौ चरणौ कृत्वा उरुसंस्थौ प्रयत्नत: । उरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा ततो दृशौ ।। 47 ।।

मूल श्लोक · 1.48

नासाग्रे विन्यसेद्राजदन्तमूले तु जिह्वया । उत्तमभ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनै: ।। 48 ।।

भावार्थ

अपने दोनों पैरों के तलवों को ऊपर की ओर रखते हुए प्रयत्न पूर्वक जंघाओं पर रखें । बायें पैर को दायीं जंघा व दायें पैर को बायीं जंघा पर । दोनों हाथों की हथेलियों को एक दूसरी के ऊपर करते हुए जंघाओं के बीच में स्थापित करें । नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर करते हुए ठुड्डी को छाती पर रखें और जीभ को सामने वाले दांतों के मूल भाग में लगा कर वहीं स्थिर कर दें व प्राण को धीरे - धीरे उर्ध्वगामी करना चाहिए । यह पद्मासन की दूसरी विधि है ।

पद्मासन के लाभ

मूल श्लोक · 1.49

इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् । दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते भुवि ।। 49 ।।

भावार्थ

इस प्रकार ऊपर वर्णित विधि को पद्मासन कहते हैं । यह पद्मासन सभी रोगों को नष्ट करने वाला होता है । यह अत्यन्त दुर्लभ आसन है । जिसे संसार में कुछ बुद्धिमान या योग्य व्यक्ति ही कर सकते हैं । सभी व्यक्ति इसे प्राप्त नहीं कर सकते । अर्थात यह सभी के लिए सहज नहीं है ।

कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बद्ध्वा तु पद्मासनम्

मूल श्लोक · 1.50

गाढं वक्षसि सन्निधाय चिबुकं ध्यायंश्च तच्चेतसि । वारंवारमपानमूध्र्वमनिलं प्रोत्सारयन् पूरितं न्यञ्चन् प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभान्नर: ।। 50 ।।

भावार्थ

पद्मासन को मजबूती से लगाकर दोनों हाथों की हथेलियों को मिलाकर जंघाओं पर रखें । ठुड्डी को छाती पर टिकाते हुए चित्त में ध्यान लगाएं । अब मूलबन्ध के द्वारा अपान वायु को बार- बार ऊपर की ओर प्रवाहित करें व अन्दर वाले प्राण वायु को नीचे की ओर ले जाने से उन दोनों वायुओं का मिलन हो जाता है । जिससे कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है और साधक को अतुल्य व असीमित ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ??

  2. Neelam

    Thank you sir

  3. Lata Sudhir Baisane

    धन्यवाद।

  4. Pooja yadav

    धन्यवाद sir

  5. Dr Smita Ekatpure

    Hii Dr Smita here, this information is very helpful and easy to understand

    Thank you