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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 18 [23-25]

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग

सात्त्विक कर्म

मूल श्लोक · 18.23

नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ।। 23 ।।

व्याख्या

जो कर्म शास्त्रों के अनुसार आसक्ति, राग, द्वेष व फल की इच्छा से रहित होकर किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है ।

राजसिक कर्म

मूल श्लोक · 18.24

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः । क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌ ।। 24 ।।

व्याख्या

परन्तु जिस कर्म को करने में अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता हो तथा जो अहंकार से युक्त होकर कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है, वह राजस ( राजसिक ) कर्म कहलाता है ।

तामसिक कर्म

मूल श्लोक · 18.25

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌ । मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ।। 25 ।।

व्याख्या

जो कर्म बिना हानि, हिंसा और सामर्थ्य पर विचार किए, अज्ञानपूर्वक किया जाता है, उस कर्म परिणाम को तामसिक कहते हैं ।