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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 16 [7-10]

अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

आसुरी प्रवृत्ति से युक्त मनुष्यों के लक्षण

मूल श्लोक · 16.7

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ।। 7 ।।

व्याख्या

जो आसुरी सम्पदा वाले व्यक्ति होते हैं, वह प्रवृत्ति और निवृत्ति के विषय में नहीं जानते अर्थात् उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? वे इसके विषय में कुछ नहीं जानते । उनके अन्दर न शुद्धि है, न सदाचार है और न ही सत्य है अर्थात् उनमें न ही तो शुद्धि का भाव होता है, न ही सदाचार का भाव होता है और न ही उनमें सत्य का आचरण होता है ।

आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों का कथन

मूल श्लोक · 16.8

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌ । अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌ ।। 8 ।।

व्याख्या

आसुरी प्रवृत्ति से युक्त लोग कहते हैं कि यह सारा संसार असत्य ( झूठा ) है, आश्रय रहित, और बिना ईश्वर के, केवल स्त्री और पुरुष के आपसी संयोग द्वारा उत्पन्न हुआ है । इसलिए काम वासना अथवा काम भावना के अतिरिक्त इस संसार का क्या उद्देश्य हो सकता है ? कुछ नहीं ।

मूल श्लोक · 16.9

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ।। 9 ।।

व्याख्या

इस प्रकार की भावना रखने वाले मन्द बुद्धि लोगों का आत्मज्ञान नष्ट हो चुका होता है । ये लोग दूसरों का अहित अर्थात् बुरा करने तथा संसार को नष्ट करने के लिए ही जन्म लेते हैं ।

मूल श्लोक · 16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ।। 10 ।।

व्याख्या

यह आसुरी प्रवृत्ति से युक्त लोग दम्भ, मान और मद में चूर होकर कभी भी पूर्ण न होने वाली कामवासनाओं का सहारा लेकर, ज्ञान के अभाव से झूठे सिद्धान्तों को ग्रहण करके, अशुद्ध विचारों को धारण करके संसार में विचरण करते हैं ।

Reader discussion

Comments (1)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Savita singh

    Thank youuuuuuu sir ????????