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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 16 [23-24]

अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

मूल श्लोक · 16.23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ।। 23 ।।

व्याख्या

इसके विपरीत जो व्यक्ति शास्त्र विधि को छोड़कर अपनी इच्छानुसार व्यवहार करता है, तो उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख मिलता है और न ही परमगति प्राप्त होती है ।

कार्य - अकार्य का भेद = शास्त्र प्रमाण

मूल श्लोक · 16.24

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ।। 24 ।।

व्याख्या

कार्य और अकार्य अर्थात् क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? इसका निर्णय हमें शास्त्र द्वारा दिए गए प्रमाण से करना चाहिए । शास्त्र विधि को जानकर ही तुम्हें इस लोक में कर्म करना चाहिए ।

विशेष

यह श्लोक व्यवहार की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है । बहुत बार हम हम इस उलझन में होते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और क्या करना अनुचित है ? तब इस उलझन को सुलझाने के लिए हमें शास्त्रों में दिए गए प्रमाणों को आधार मानकर ही प्रत्येक कार्य करना चाहिए । शास्त्र ही वह प्रमाण हैं जो हमें सही और गलत का अन्तर बताते हैं । अतः जब भी व्यक्ति कर्तव्य और अकर्तव्य के बीच की उलझन में फंसा हुआ हो, तो उसे शास्त्रों द्वारा बताए गए प्रमाण का सहारा लेना चाहिए । इस प्रकार हम अपने निर्धारित कर्मों को करते हुए शीघ्र ही परमगति को प्राप्त हो जाएंगे ।

सोलहवां अध्याय ( दैवासुरसम्पद् विभागयोग ) पूर्ण हुआ ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Savita singh

    Very very very thank you sir

    ????????

  2. Anshu

    Prnam Aacharya ji. 16ve adhyaya Ka sunder varnan kr pariksha drishtikon prstut krne ke liye. Aapka bhut bhut Dhnyavad.Jai Sriradhekrishna.