Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 14 [4-6]
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
बीज स्थापना ( गर्भ स्थापना )
मूल श्लोक · 14.4
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।। 4 ।।
व्याख्या
हे कौन्तेय ! सभी योनियों में जितने भी मूर्त रूप ( शरीरधारी ) प्राणी जन्म लेते हैं, उनकी ब्रह्म रूप प्रकृति योनि है और मैं उस योनि में बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ ।
विशेष
- प्रकृति रूपी योनि में गर्भ की स्थापना किसके द्वारा व किस रूप में की जाती है ? उत्तर है - ईश्वर द्वारा पिता के रूप में ।
आत्मा द्वारा शरीर धारण = त्रय गुणों के कारण
मूल श्लोक · 14.5
रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।। 5 ।।
व्याख्या
हे महाबाहो अर्जुन ! सत्त्व, रज व तम नामक तीन गुणों की उत्पत्ति प्रकृति से होती है । ये तीनों गुण ही उस अविनाशी आत्मा को इस शरीर में बाँधते हैं अर्थात् आत्मा हमारे शरीरों में इन तीन ( सत्त्व, रज व तम ) गुणों के कारण ही निवास करती है ।
विशेष
- शरीर में आत्मा को किसके द्वारा बाँधा जाता है ? उत्तर है - सत्त्व, रज व तम के कारण ।
सत्त्व गुण का प्रभाव
मूल श्लोक · 14.6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ।। 6 ।।
व्याख्या
हे निष्पाप अर्जुन ! इन तीनों गुणों में से जो सत्त्वगुण है, वह पवित्र होने के कारण प्रकाशित करने वाला और निर्विकार ( सभी विकारों अथवा दोषों से रहित ) है । उसका सुख और ज्ञान के साथ सम्बन्ध अथवा जुड़ाव होने से वह आत्मा को शरीर के साथ बाँधता है ।
विशेष
- सत्त्वगुण की उत्पत्ति किसके कारण होती है अथवा सत्त्वगुण की क्या विशेषताएँ हैं ? उत्तर है - सत्त्वगुण पवित्र, प्रकाशवान व सभी विकारों से रहित ( निर्विकार ) है ।
सत्त्वगुण के किन दो गुणों के कारण आत्मा शरीर के साथ बन्धन में बँधता है ? उत्तर है - सुख व ज्ञान के साथ सम्बन्ध होने के कारण ।
Very very
Thank you sir????????
Prnam Ascharya ji .Dhanyavad
Good sir