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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 14 [26-27]

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

गुणातीत होने के उपाय

मूल श्लोक · 14.26

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ।। 26 ।।

मूल श्लोक · 14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।। 27 ।।

व्याख्या

जो पुरुष अपने सभी कर्मों को मुझमें समर्पित कर, भक्तियोग से परिपूर्ण होकर मेरी सेवा करता है अथवा मेरा भजन करता है, वह इन तीनों गुणों ( सत्त्व, रज व तम ) से मुक्त होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेता है -

क्योंकि मैं ही उस अविनाशी ब्रह्मा के अमृत,  विकार रहित, शाश्वत ( नित्य ) धर्म और अखण्ड आनन्द का एकमात्र आश्रय हूँ ।

विशेष

इन दोनों ही श्लोकों में गुणों से रहित अर्थात् गुणातीत होने के उपाय बताए गए हैं ।

चौदहवां अध्याय ( गुणत्रयविभागयोग ) पूर्ण हुआ ।

Reader discussion

Comments (6)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Savita singh

    Thank you sir????????

  2. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ????????

  3. Aashish malhan

    Guru Ji nice explain about gunatit way.

  4. Neelam Dwivedi

    Thank you Sir

  5. Savita Singh

    Again thank you sir ????????

  6. Anshu

    Prnam aacharya jj . Sri Govind Sharanam. Sunder.om