Hatha Pradipika
Hatha Pradipika Ch. 5 [7-12]
पित्त के असन्तुलन से होने वाले रोग
मूल श्लोक · 5.7
उन्मार्गं प्रस्थितो वायु: पित्तकोष्ठे यदा स्थित: । हृच्छूलं पार्श्वशूलं च पृष्ठशूलं च जायते ।। 7 ।।
भावार्थ
जब प्राणवायु अपने मार्ग से हटकर पित्त प्रकोष्ठ में चली जाती है । तब हमारे हृदय प्रदेश, हृदय के साथ वाले हिस्से में व पीठ ( कमर ) में पीड़ा ( दर्द ) का अनुभव होता है ।
पित्त से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा
मूल श्लोक · 5.8
तैलाभ्यङ्गं तदा पथ्यं स्नान चोष्णेन वारिणा । सघृतं पायसं भुक्त्वा जीर्णेऽन्ने योगमभ्यसेत् ।। 8 ।।
भावार्थ
जिस भी साधक का पित्त असन्तुलित हो गया है । तब उसे तेल की मालिश व गरम पानी से स्नान करना लाभदायक होता है । साथ ही उसे घी व खीर जैसे शीघ्र पचने वाले खाद्य पदार्थ का सेवन करना चाहिए और उनके पचने ( हजम ) पर योग का अभ्यास करना चाहिए ।
मूल श्लोक · 5.9
यस्मिन् यस्मिन् यदा देशे रुजा बाधा प्रजायते । तस्मिन् देशे स्थितं वायुं मनसा परिचिन्तयेत् ।। 9 ।।
भावार्थ
शरीर के जिस भी हिस्से में वायु के रुकने के कारण पीड़ा ( दर्द ) हो रही है । तब वहीं अर्थात् उसी स्थान पर स्थित प्राणवायु का मन द्वारा चिन्तन करना चाहिए ।
मूल श्लोक · 5.10
एकचित्तेन तद् ध्यात्वा पूरयेत् पूरकेण तु । नि:शेषरेचकं कुर्यात् यथाशक्तया प्रयत्नतः ।। 10 ।।
भावार्थ
अपने चित्त को दर्द वाले स्थान पर एकाग्र करते हुए पहले वायु को अन्दर भरें ( फेफड़ों में ) । इसके बाद अपने सामर्थ्य ( ताकत ) के अनुसार उस प्राणवायु को बाहर निकाल दें ।
विशेष
इस श्लोक में वायु को पूरक ( अन्दर ) व रेचक ( बाहर ) करने की बात कही गई है ।
मूल श्लोक · 5.11
बहुधा रेचकं कृत्वा पूरयित्वा पुनः पुनः । कर्षयेत् प्राक्स्थितं वायुं कर्णतोयमिवाम्बुना ।। 11 ।।
भावार्थ
जिस प्रकार नहाते हुए जब गलती से कान में पानी चला जाता है तो उसे निकालने के लिए हम उसी कान में थोड़ा सा पानी और डाल लेते हैं । जिससे पहले गलती से गया हुआ पानी भी इस पानी के साथ वापिस आ जाता है । ठीक इसी प्रकार जो प्राणवायु गलती से गलत मार्ग में जाकर रुक गयी है । उस वायु को बाहर निकालने के लिए साधक को बार- बार श्वास को अन्दर व बाहर करना चाहिए । ताकि इसके साथ वह रुका हुआ वायु बाहर निकल सके ।
विशेष
इस श्लोक में बताया गया नुस्खा अत्यन्त उपयोगी होता है । मैंने स्वयं इसका प्रयोग बहुत बार किया है । बचपन में नहर व तालाब में नहाते हुए अनेक बार मेरे कान में पानी चला जाता था । जिससे सुनने में कठिनाई होती थी और सिर में भारीपन हो जाता था । लेकिन एक दिन गाँव की ही नहर में नहाते हुए मेरे दोस्त मनोज के भी कान में पानी चला गया । उसने तुरन्त अपने हाथ की अंजलि में पानी लेकर अपने उसी कान में डाल लिया । जब मैंने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि जब भी कान में पानी चला जाये तो ऐसा ही करना चाहिए । जिससे पहले गलती से गया हुआ पानी बाहर निकल जाता है । इसके बाद उसने अपने कान को नीचे की ओर झुकाया और पानी झट से निकल गया । इसके लिए व्यक्ति को पूरी विधि का प्रयोग करना पड़ेगा । अन्यथा कान से पानी बाहर नहीं निकलेगा । इसके लिए जिस कान में पानी गया है उसी कान में और पानी डालकर उस कान को नीचे की ओर झुकाना चाहिए । ताकि पानी आसानी से बाहर निकल जाए । ठीक इसी फार्मूले ( विधि ) का प्रयोग हमें शरीर के अन्दर रुकी हुई वायु को बाहर निकालने के लिए करना चाहिए ।
मूल श्लोक · 5.12
प्रायः स्निग्धमाहरं च इह भुञ्जीत योगवित् । एवं शूलादयो रोगा: शाम्यन्ति वातपित्तजा: ।। 12 ।।
भावार्थ
योगी साधक को इस अवस्था में अपने भोजन में स्निग्ध अर्थात् दूध से बने चिकने पदार्थों का ही प्रयोग करना चाहिए । इस प्रकार का आहार ग्रहण करने से साधक के सभी वात और पित्त से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं ।
ॐ गुरुदेव *
आपका परम आभार!
Very nice,thank you sir
धन्यवाद।
Prnam Aacharya ji. Sunder vernan