Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 17 [20-22]
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
सात्त्विक दान = योग्य व्यक्ति, समय व स्थान पर कर्तव्य भावना से
मूल श्लोक · 17.20
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ।। 20 ।।
व्याख्या
जो दान उपयुक्त देश ( स्थान ), काल ( समय ) और पात्र ( योग्य व्यक्ति ) को बिना उपकार की भावना के अर्थात् उसे कर्तव्य कर्म मानते हुए दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है ।
विशेष
- सात्त्विक दान के लिए किन - किन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए ? उत्तर है - उपयुक्त स्थान, समय और पात्र व्यक्ति के सही चुनाव पर ।
राजसिक दान = क्लेश, प्रत्युपकार व फल प्राप्ति की इच्छा सहित
मूल श्लोक · 17.21
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ।। 21 ।।
व्याख्या
जो दान किसी के उपकार के बदले में ( किसी द्वारा किए गए अहसान का बदला चुकाने के लिए ) व फल प्राप्ति की इच्छा से क्लेशपूर्वक किया जाता है, उसे राजसिक दान कहते हैं ।
विशेष
- राजसिक दान किस भावना से किया जाता है ? उत्तर है - प्रत्युपकार, फलासक्ति व क्लेशपूर्ण भावना से ।
तामसिक दान = बिना मान- सम्मान के अयोग्य व्यक्ति को
मूल श्लोक · 17.22
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ।। 22 ।।
व्याख्या
जो दान अनुपयुक्त देश ( गलत स्थान ), अनुपयुक्त काल ( गलत समय ) व अयोग्य व्यक्ति को, बिना मान - सम्मान के अर्थात् तिरस्कारपूर्ण तरीके से दिया जाता है, वह तामसिक दान होता है ।
विशेष
- सबसे निकृष्ट दान किसे कहा जाता है ? उत्तर है - तामसिक दान को ।
गीता में किस दान को तामसिक कहा गया है ? उत्तर है - अनुपयुक्त स्थान, समय और व्यक्ति को, बिना सम्मान के दिया गया दान तामसिक कहा गया है ।